(20) छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा।
पंकज खन्ना
9424810575
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(15) हो लाख मुसीबत रस्ते में। प्यासा (1957) 14/3
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(17) आहा बदला ज़माना वाह वाह बदला ज़माना। मिस इंडिया (1957) 28/3
(19) माना जनाब ने पुकारा नहीं। पेइंग गेस्ट (1957)7/4
आज का गाना: (20) छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा (1957) पेइंग गेस्ट।
गाना: छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा फिल्म: पेइंग गेस्ट (1957)।गायक: किशोर कुमार। गायिका: आशा भोंसले। गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी।संगीतकार: एस डी बर्मन। पर्दे पर: देव आनंद और नूतन। गाने के बोल। फिल्म के सभी गाने।
गाने की शुरुआत में देव आनंद और नूतन को साइकिल चलाते हुए दिखाया गया है। दोनों साइकिल से बगीचे में पहुंचते हैं और बगैर किसी लाग लपेट के गाना शुरू कर देते हैं: छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा ।
(गाने के स्क्रीनशॉट्स का कोलाज।)
गाने का प्रारंभ ही आशा भोंसले के 'अह' से होता है। ज़रा सुनिए इस 'अह' को। हमें तो आज भी ये 'अह' बहुत जानलेवा लगता है। पिछले साइकिल गीत ( माना जनाब ने पुकारा नहीं) में अगर कोई कमी थी तो सिर्फ आशा भोंसले की ही थी।
आज के गाने में ये कमी भी पूरी हो जाती है! नूतन के हाव भाव और चेहरे की प्रसन्नता बहुत अच्छे से आशा भोंसले की गायकी से घुलमिल जाती हैं।
गाने में पहले तो बाउजी नूतन का आंचल पकड़ते हैं और फिर धीरे से हाथ भी थाम लेते हैं। और ये गाती रहती हैं: छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा।
चंचल नूतन आंचल छोड़ने को कहती हैं और खुद गलबहियां डालकर बहुत प्यार से नाचती गाती हैं! देखो तो!
उनके कहने का मतलब शायद यही था: 'आंचल नहीं, हाथ थामिए!' हाथ ही थाम लिया जाए तो फिर जमाना क्या कहेगा!
देव आनंद गाने में एक पोल को दोनों हाथों से पकड़ लेते हैं। नूतन इनके और पोल के बीच में से बड़ी अदा के साथ निकलकर पोल पकड़ लेती हैं कुछ इस तरह:
इसे 'Pole Dance' तो नहीं लेकिन 'Soul Dance' जरूर कह सकते हैं! आप खुद देखिए गाने में। फिर से गाने का लिंक लगा देते हैं, सिर्फ आपके लिए!
इस पेंसिल स्केच में देखिए, दोनों के चेहरे से कैसे मस्ती और शरारत टपक रही है! हम से पिछली पीढ़ी मर मिटी इनके ग्लैमर पर। हमारा भी यही हाल है! हम तो चाहते हैं अगली पीढ़ियां भी मर मिटें ऐसे गानों पर। इसीलिए तो लिखे जा रहे हैं तवा संगीत , रेल संगीत और साइकल संगीत!
शायद आज के बाद आपकी भी हिंदी फिल्म संगीत की फेवरेट टीम यही हो जाए: एस डी बर्मन, मजरूह सुल्तानपुरी, किशोर कुमार, आशा भोंसले, देव आनंद और नूतन! ( इसी टीम ने इसी फिल्म में ये प्यारा गीत भी दिया है: ओ निगाहें मस्ताना। इस गीत में आशा भोंसले ने सिर्फ Humming की है, मतलब गीत सिर्फ गुनगुनाया है।)
हमारे लिए आज के गाने में सब कुछ है: प्राचीन जमाने की साधारण लेकिन खूबसूरत साइकिलें, एस डी बर्मन का अलौकिक संगीत, मजरूह के सीधे दिल में उतर जाने वाले शब्द, किशोर और आशा की उम्दा गायकी, नूतन की दिलफेंक अदाएं, देव आनंद की मनमोहक स्टाइल, दोनों के बीच की अद्भुत केमिस्ट्री और दोनों का एक दूसरे का प्यार से हाथ थामना। क्या कभी किसी और गाने में भी इतनी प्यारी स्टाइल में हाथ थामे गए हैं?
दोस्तों, 'हाथ पकड़ने' वाले गाने मत गिनाइए! 'हाथ थाम लेना' और 'हाथ पकड़ लेना' में बहुत अंतर होता है। हाथ तो कभी भी कहीं भी पकड़ लिया जाता है। काम निकलने पर या मन भरने पर या बस यूं ही हाथ छोड़ दिया जाता है। आज की दोस्तियों में ये अधिक देखा जाता है।
जमाना बदल गया है, पुरानी दोस्तियाँ भी नई दास्तानें पेश कर रही हैं। देर रात में अगर इनके साथ खाओ-पीओ, DJ/ Karaoke के शोर में नाचो-गाओ नहीं; तो हाथ बेरहमी से झटक दिया जाता है! (कुछ दोस्तों को तो WhatsApp Group से भी बाहर पटक दिया जाता है;)
'हाथ थामना' सिर्फ एक शारीरिक क्रिया नहीं है। इसमें भावनात्मक जुड़ाव और सुरक्षा का भाव होता है। 'हाथ थामना' विश्वास, प्रेम और सहारे का प्रतीक है।
अंत में संक्षेप में सिर्फ यही कहना है: आंचल छोड़िए, हाथ थामिए हाथ! हाथ झटकिए या पटकिए नहीं। पटकना ही है तो पद, प्रतिष्ठा, पैसे, पिंड आदि का पलीद परवाज़ (अहंकार) पटकिए, प्रभु जी।🙏🙏
हम सुनें या न सुनें; कबीर सैकड़ों वर्ष पहले कह गए हैं, हम सब के लिए: मत कर माया को अहंकार।
साइकिल को थाम लीजिए, संगीत को थाम लीजिए। साइकिल संगीत भी थम जाएगा आपके लिए!
पंकज खन्ना
9424810575
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