(9) देखी पंछी ये फुलवारी।

पंकज खन्ना
9424810575

               
साइकिल संगीत की अगली/पिछली ब्लॉग पोस्ट्स: 
(1) साइकल संगीत-परिचय (3/6/2025)
(2) सावन के नज़ारे हैं। (खजांची 1941) 15/8
(3) ओ दूधवाली ग्वालनिया (सीधा रास्ता 1947) 23/8
(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950) 3/9
(7) ओ साइकिल वाले बाबू ( अजीब लड़की 1950) 17/1
(8) आया रे आया रे आया रे भाजीवाला। तूफ़ान और दिया (1956)।

गीतदेखी-देखी पंछी, देखी ये फुलवारी। (जलदीप) (1956) गायक : स्नेहल भाटकर और साथी। गीतकार :  किदार शर्मा। संगीतकार: स्नेहल भाटकर। निर्माता: बाल चित्र समिति। (Children's Film Society. CFSI)


फिल्म जलदीप (1956) बाल चित्र समिति (Children's Film Society India,  CFSI)  द्वारा बनाई गई  पहली बाल फिल्म थी। साठ और सत्तर के  दशक में स्कूलों और मोहल्लों में CFSI द्वारा बनाई गई फिल्में 16 mm के प्रोजेक्टर पर अक्सर दिखाई जाती थीं, विशेषतः बाल दिवस पर। सभी बच्चे इन फिल्मों को बड़े शौक और उत्साह से देखते थे। बड़े लोग भी देख लिया करते थे। उस जमाने में तो लगभग सभी फुरसत में रहते थे। ( अब हम विकासशील लोग बस जुगाड़ या फितरत में  रहते हैं; फुरसत में तो बिल्कुल नहीं। )



बाल फिल्म जलदीप का कथानक कुछ यूं है:

अशोक (अशोक शर्मा, किदार शर्मा के पुत्र) अपनी कज़िन प्रीति (प्रीतिबाला उर्फ  ज़ेब रहमान ) को जलदीप अर्थात लाइटहाउस ले जाने का फ़ैसला करता है। चंदन, एक लापरवाह लड़का, अशोक और प्रीति को लेकर नाव चलाता है। दिखावा करने के चक्कर में, वह बेवजह रिस्क लेता है और खतरे को न्योता देता है। मामला और बिगड़ जाता है, क्योंकि नाव अचानक आए तूफ़ान में फँस जाती है। नाव पर सवार तीनों लगभग खतरे में पड़ जाते हैं, जब तक कि अशोक के पिता, जो लाइटहाउस (जलदीप) कीपर हैं, उन्हें बचा नहीं लेते। शर्मिंदा चंदन अच्छा बच्चा बनकर एक नई ज़िंदगी शुरू करता है।

आज का साइकिल गीत बचपन से जुड़ा होने के कारण दिल में विशेष स्थान रखता है। इस गाने में, बच्चे स्कूल के वार्षिक प्रोग्राम के बाद साइकिल से हंसते-गाते घर लौट रहे हैं।

गाने की शुरुआत में सुंदर ग्रामीण पृष्ठभूमि में  कुछ बैलगाड़ियां दिखाई देती है और उनके पीछे बच्चे गाते हुए साइकिल पर दिखाई देते  हैं। कुछ बच्चे बेलगाड़ी पर बैठे और गाते भी दिखाई देते हैं।  एक प्यारा सा गोलू बालक 'दुबे' भी बैलगाड़ी पर बैठा है, गाता नाचता हुआ। 

एक साइकिल वाली एक हाथ से बैलगाड़ी के पिछले हिस्से को पकड़ कर साइकिल और बैलगाड़ी दोनों का आनंद ले रही है। एक बालक को गधे की सवारी करते भी दिखाया गया है।

गाने में अशोक अपनी  फिल्म की बहन प्रीति  को बैठाकर साइकिल चला रहे हैं और स्नेहल भाटकर की आवाज में गा रहे हैं: देखी पंछी ये फुलवारी। बाकी बच्चे कोरस में गा रहे हैं।


(अशोक और प्रीति, फिल्म के प्रमुख किरदार।)

अब साइकिल पर बहनों या प्रेमिकाओं को ऐसे आगे बैठाने का रिवाज नहीं रहा। और ऐसी देसी साइकिलें भी कम हो गई हैं।


इनकी फोटो में रंग भर तो दिया है, लेकिन जीवन में कैसे भरें!? ढूंढो तो  रंग श्वेत और श्याम में भी मिल जाते हैं, नहीं तो रंग भी बस 'भंग' हैं। ढूंढो रे साजना...!

बच्चों को कितना भी समझाओ  'पानी में सैकल ने डालो', वो नहीं मानेंगे! हम भी नहीं मानते थे! आप साइकिल संगीत के परिचय में पढ़ ही चुके हैं।


बच्चों ने रास्ते में नदी, पहाड़, जंगल, निर्मल धारा, हरियाली, मंदिर, रंग बिरंगे फूल, फूलों की क्यारी, फुलवारी, और धनक (इंद्रधनुष) आदि भी देखे। आप भी ऊपर-नीचे थोड़ा सा देख लीजिए, स्क्रीन शॉट्स में:



गाने के बीच में 'धनक' या इंद्रधनुष श्वेत और श्याम रंग में दिखाई देता है! वाह! ऐसा लगता है जैसे बच्चों ने धनक छू ही लिया है! 

धनक की बात हो तो घर नंबर 44 के गाने का ये अंतरा याद आ ही जाता है: झूला धनक का धीरे धीरे हम छू लें.. अम्बर तो क्या है, तारों के भी लब छू लें! 


ये दोनों बच्चे भी शायद यही कहना और करना चाहते हैं। 

अब आज के गाने के बोल भी पढ़ लिये जाएं :

देखी देखी, देखी देखी देखी, देखी पंछी, पंछी देखी ये फुलवारी, पंछी देखी ये फुलवारी-2

कैसी प्यारी है हर क्यारी, कैसी प्यारी है हर क्यारी। पंछी देखी ये फुलवारी। पंछी देखी ये फुलवारी।

दुल्हन बन कर शाखें झूमें, माएँ बच्चों का मुंह चूमें।

इत हरियाली, उत हरियाली। है कोई बड़ा सियाना माली जिसने की है ये गुलकारी।

देखी देखी, देखी देखी देखी, देखी पंछी, पंछी देखी ये फुलवारी, पंछी देखी ये फुलवारी।

देखि निर्मल जल की धारा, पिघली चांदी बहता पारा। छोटे पौधे ऊंचे मंदिर।

जल बाहर, जल के अंदर। है ये किसकी महिमा सारी।

देखी देखी, देखी देखी देखी, देखी पंछी, पंछी देखी ये फुलवारी, पंछी देखी ये फुलवारी

सुंदर फूल कहीं हैं पीले, उदे लाल, बसंती, नीले। वो काले भँवरों की टोली। कैसी खेली सब ने होली। ना है रंग, ना है पिचकारी।

देखी देखी, देखी देखी देखी, देखी पंछी, पंछी देखी ये फुलवारी, पंछी देखी ये फुलवारी।

सारी दुनिया जब है सोती, शबनम लाती है कुछ मोती। किरणें सूरज की आती हैं,ये सब मोती ले जाती है। दे कर गोटा और किनारी।

देखी देखी, देखी देखी देखी, देखी पंछी, पंछी देखी ये फुलवारी, पंछी देखी ये फुलवारी।

कैसी प्यारी है हर क्यारी, कैसी प्यारी है हर क्यारी। पंछी देखी ये फुलवारी। पंछी देखी ये फुलवारी।

देखी देखी, देखी देखी देखी, देखी पंछी, पंछी देखी ये फुलवारी, पंछी देखी ये फुलवारी।

इस बाल फिल्म में तीन ही गीत हैं। तीनों ही सरल भाषा में हैं। मधुर और श्रेष्ठ हैं। सादगी की मिसाल हैं। 

दूसरा गीत है तू अपने मन का दीप जला । इसे गाया है सुधा मल्होत्रा और स्नेहल भाटकर ने। गीत नहीं भजन है, प्रेरणा है। आप से अनुरोध है इसे अवश्य सुनें और हो सके तो मन ही मन गाएँ भी। बच्चों को सुनाएं भी। शायद वो एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देंगे; तब भी सुनाएं! कोशिश करें। ये गीत मन को हल्का करेगा, अच्छा लगेगा। 

तीसरा गीत है: छोटा सा पप्पू हूँ। इसे गाया है बालक दुबे और प्रीतिबाला ( ज़ेब रहमान ) ने। थोड़ा मस्ती भरा गीत है। आखिर बाल फिल्म का गीत है। इस प्यारे गाने को सुनने के बाद ना तो आपको पप्पू कांट डांस साला गाना है और ना ही इसमें किसी राजनीति वाले को देखना है। और ये गीत फॉरवर्ड तो बिल्कुल ही नहीं करना है। लोग बिन बादल बरस पड़ेंगे आप पर!

इन तीनों गानों को सुनने के बाद बस यही विचार आता है कि ऐसे गाने और ऐसा संगीत क्यों गुमनाम है। इन गीतों की सादगी दिल और दिमाग पर हमेशा के लिए छा जाती है। और इनके संगीत के बारे में तो क्या ही लिखें। बस सुनते रहें और गायक संगीतकार स्नेहल भाटकर का गुणगान करते रहें।

इनके नाम में ही स्नेह है जो उनके संगीत से भी सतत् टपकता है। स्नेहल भाटकर के गीत बार-बार सुनने पर धीरे-धीरे खुलते हैं। पहली 'सुनवाई' में सादे लगते हैं, लेकिन फिर उनके स्नेहल, कोमल  संगीत की मधुर परतें सामने आती जाती हैं। यही उनके संगीत की असली खूबसूरती है। उनके बारे में और जानने के लिए ये वीडियो देख सकते हैं। और इस वीडियो को भी देख सकते हैं।

उनके कुछ खास, प्रसिद्ध और कुछ कम सुने गानों के भी लिंक नीचे दिए हैं:

(1) तुम मेरा दिल लुभाओ तो जानूं । बेगम पारा। पगले (1949)।
(2) मोहब्बत भी झूठी, जमाना भी झूठा। मुकेश। हमारी बेटी (1950)।
(3) ए मेरे हमसफर रोक अपनी नज़रनूतन। छबीली (1960)।
(4) लहरों पे लहर , उल्फत है जवाँ। हेमंत कुमार और नूतन।  छबीली(1960)।
(5) ओ माय डार्लिंग, ओ माय स्वीटीनूतन और महेंद्र कपूर। छबीली (1960)।
(6) कभी तन्हाईयों में यूं हमारी याद आएगी। गायिका: मुबारक बेगम। फिल्म : हमारी याद आएगी (1961)
(7) सोचता हूँ ये क्या किया मैंने। मुकेश और लता। हमारी याद आएगी ( 1961)
(8) फरिश्तों की नगरी में मैं आ गया हूं। मुकेश और मुबारक बेगम। हमारी याद आएगी (1961)।

लिखना तो किदार शर्मा के बारे में भी है। लेकिन आज बस इतना ही। ऊपर लिखे गाने ही सुन लीजिए, करार आ जाएगा। मन स्नेहल स्नेहल हो जाएगा।🙏

और गैस करिए, अगला साइकिल गीत कौनसा होगा!? समझ लीजिए, सलोने दिन बस आने ही वाले हैं!



पंकज खन्ना 
9424810575

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