(15) हो लाख मुसीबत रस्ते में (1957) प्यासा।
पंकज खन्ना
9424810575
साइकिल संगीत की अगली/पिछली ब्लॉग पोस्ट्स:
(1) साइकल संगीत-परिचय (3/6/2025)
(2) सावन के नज़ारे हैं। (खजांची 1941) 15/8
(3) ओ दूधवाली ग्वालनिया (सीधा रास्ता 1947) 23/8
(4) ए मोहब्बत उनसे मिलने ( बाजार 1949) 29/8
(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950) 3/9
(6) एक दिन लाहौर की ठंडी (सगाई 1951) 10/9
(7) ओ साइकिल वाले बाबू ( अजीब लड़की 1950) 17/1
(8) आया रे आया रे आया रे भाजीवाला। तूफ़ान और दिया (1956) 31/1
(9)देखी-देखी पंछी, देखी ये फुलवारी। जलदीप (1956) 7/2
(10) सांवले सलोने दिन आए बहार के। एक ही रास्ता (1956)14/2
(11) बड़े भैया लाए हैं लंदन से छोरी। एक ही रास्ता (1956)18/2
(12) हमको हँसते देख ज़माना जलता है।हम सब चोर हैं। (1956) 21/2
(13) चले बजाते सीटी, जीवन की राहों में। जमाना(1957) 28/2
(14) बच के बलम चल कि रास्ता है मुश्किल। जॉनी वॉकर(1957) 7/3
आज का गाना:(15) हो लाख मुसीबत रस्ते में।
गाना: हो लाख मुसीबत रस्ते में। फिल्म: प्यासा (1957)। गायक: रफी। गायिका: गीता दत्त। गीतकार: साहिर लुधियानवी। संगीतकार : सचिन देव बर्मन। पर्दे पर: गुरुदत्त और माला सिन्हा। प्यासा फिल्म के सभी गाने।
गाने के बोल:
हों लाख मुसीबत रस्ते में
पर साथ ना अपना छूटे।
टूटे ना मोहब्बत की कसमें
अब चाहे क़यामत टूटे।-2
पीछे पीछे दुनिया है आगे आगे हम। बढ़ते ही जाते हैं कदम हरदम। कहाँ का सफर है किसको खबर है। हमको नहीं है ग़म। हो हो हो।
बहुत हसीन साइकिल गीत है आज का। फिल्म प्यासा के अन्य हिट गानों की तुलना में काफी कम प्रसिद्ध है। गीत थोड़ा छोटा लेकिन बहुत प्यारा है। छोटे से गीत में काफी सारी बाते हैं। आओ समझते हैं।
गाने की शुरुआत में माला सिन्हा कॉलेज की क्लास में दिखाई गई हैं। अन्य छात्र और छात्राएं उनपर हँस रहे हैं, टुन टुन भी।
दूसरे सीन में गुरुदत्त और माला सिन्हा को बैडमिंटन खेलते दिखाया गया है। शायद हिंदी फिल्मों में सबसे पहले हीरो हीरोइन बैडमिंटन इसी गाने में खेले हैं। ( बैडमिंटन पर सन 1970 की फिल्म हमजोली का गीत ढल गया दिन हो गई शाम काफी प्रसिद्ध हुआ था और इसे त्रुटिवश पहला बैडमिंटन गीत मान लिया जाता है। ) लेकिन फिल्म प्यासा के इस पुराने गीत में दोनों का बैडमिंटन खेलना अधिक सहज, रोमांटिक और बहुत मनभावन है। कोई फालतू लटके-झटके नहीं हैं। खेल है और इश्क-मोहब्बत है। एक बार देखें जरूर।
काश ये थोड़ा और बैडमिंटन हमें दिखा देते! लेकिन कोई शिकायत नहीं है। क्योंकि यहां बात तो साइक्लिंग की ही महत्वपूर्ण है। और वो होगी ही।
बैडमिंटन खेलने के बाद दोनों अन्य छात्रों के साथ दूर कहीं जंगल में साइकिल पर चल पड़ते हैं। सही है, साइकिल यात्रा अधिक आवश्यक है। हमारे लिए साइकिल यात्रा ही कबीर यात्रा है। और कबीर यात्रा ही जीवन यात्रा है। दो पहिये ही दो पाटन हैं।
ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है। एक पहिया इच्छाओं का है और दूसरा संयम का। केवल इच्छाएँ हों तो आदमी भटक जाता है, और केवल संयम हो तो जीवन सूखा लगने लगता है। दोनों गति और संतुलन के साथ चलें तभी यात्रा ठीक चलती है। नहीं तो वहीं यात्रा संपन्न भी हो सकती है!
साइकिल यात्रा पर फिर से ध्यान लगाते हैं!
तो आधा रास्ता कवर करने के बाद गुरुदत्त और माला सिन्हा अन्य दोस्तों को छोड़कर पतली गली से ऐसे निकल्लेते हैं:
और जब दोनों जंगल में तन्हाइयों में साइकिल से आगे बढ़ जाते हैं तो गाने में गोल होंठों वाली सीटी बजने लगती है। साइकिल हो और साथ में सीटी भी हो तो मज़ा दोगुना हो जाता है।
इस डेढ़ मिनट के गाने के अंत में गुरुदत्त को खयालों में गुम दिखाया गया है। (इतने पैसे खर्च किए फिल्म बनाने में, थोड़ी साइकिल और चलवा लेते!)
मामला फ्लैश बैक का है और गुरुदत्त अपना सुनहरा अतीत याद कर रहे हैं। दरअसल फिल्म में गुरुदत्त ने माला सिन्हा को बहुत समय बाद कार से उतरकर एक दुकान के अंदर जाते देखा तो उन्हें कॉलेज के दिनों का रोमांस याद आ गया। और यह आधा अधूरा गाना इसी याद के हिस्से के तौर पर दिखाया गया है।
फिल्म प्यासा और इसके प्रसिद्ध गानों के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है जो नेट पर बड़ी आसानी से उपलब्ध भी है। लेकिन इस गीत को कभी ज्यादा भाव नहीं मिले। जबकि इस गाने में मधुर संगीत और गायकी के साथ और भी कई विशेषताएं हैं, जैसे:
(I) ये सिर्फ एक प्रेम गीत ही नहीं बल्कि थोड़ा सा दार्शनिक और प्रेरणादायक गीत भी है: हों लाख मुसीबत रस्ते में पर साथ ना अपना छूटे। टूटे ना मोहब्बत की कसमें अब चाहे क़यामत टूटे।
(II) पहली बार हीरो हीरोइन को बैडमिंटन खेलते दिखाना। गुरुदत्त का शटलकॉक पकड़ने के बहाने माला सिन्हा का हाथ पकड़ लेना। माला सिन्हा का बेहतरीन हाव भाव के साथ शर्मा जाना। उस जमाने के आगे बैठने वाले दर्शकों ने इस दृश्य पर बहुत सीटियां बजाई होंगी और चवन्नियां लुटाई होंगी। तब सीटियों के बगैर सिनेमा हॉल में गाने चलते नहीं थे। मल्टिप्लेक्स देखकर बड़े होने वाली पीढ़ियां इस आनंद से वंचित रह जाएंगी;)
(III) इस गाने में साइकिल के साथ गोल मुंह वाली इंसानी सीटी ( Whistling) भी है। आप जानते हैं साइकिल गीत और सीटी वाले बहुत सारे गीत हैं। लेकिन ऐसे गीत जिनमें साइक्लिंग भी हो और सीटी भी हो, बहुत कम हैं।
अभी तक हम तीन साइकिल सीटी वाले गीतों पर चर्चा कर चुके हैं:
(2) सावन के नज़ारे हैं। (खजांची 1941)
(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950)
(13) चले बजाते सीटी, जीवन की राहों में। (जमाना 1957)।
इस तेरहवें ब्लॉग पोस्ट में गानों में सीटी के बारे में थोड़ी बातें की गई हैं। एक बार रिवाइज़ कर लें! महत्वपूर्ण है। वार्षिक परीक्षा में पूछा जा सकता है!
(IV) प्रेमियों द्वारा प्रेमिकाओं को साइकिल पर आगे बैठाकर साइकिल चलाने की प्रथा भी शायद यहीं से शुरू हुई है। क्या इसके पहले भी कोई साइकिल गीत बना है जिसमें हीरो हीरोइन को साइकिल पर आगे बैठाकर साइकिल चला रहे हों!? आपको याद आए तो जरूर बताइए। (देखी-देखी पंछी, देखी ये फुलवारी गीत में भाई अपनी बहन को साइकिल पर आगे बैठाए दिखाई दिए हैं।)
ये साइकिल पर आगे बैठाकर चलाने वाली प्यारी प्रथा तो अब लुप्तप्राय ही हो गई है। अच्छी बात ये है कि कुछ साइकिल गीत गुजरे ज़माने में जरूर बने हैं जिनमें हीरो, हीरोइन को साइकिल पर आगे बिठाकर साइकिल चलाते दिख जाते हैं। आने वाले हफ्तों में ऐसे साइकिल गीतों पर चर्चा होगी जोर से। बहुत जोर से! तब तक साइकिल चलती रहे और आपके जीवन का बैंड बजता रहे। मतलब आपके जीवन में संगीत बजता रहे!
पंकज खन्ना
9424810575
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