(11) बड़े भैया लाए हैं लन्दन से छोरी।



पंकज खन्ना
9424810575

               
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(1) साइकल संगीत-परिचय (3/6/2025)
(2) सावन के नज़ारे हैं। (खजांची 1941) 15/8
(3) ओ दूधवाली ग्वालनिया (सीधा रास्ता 1947) 23/8
(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950) 3/9
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गीतबड़े भैया लाए हैं लंदन से छोरी।फिल्म: एक ही रास्ता(1956)।  गायिका: आशा भोसले। गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी। संगीतकार: हेमंत कुमार। 


आज का गीत एक हंसी मजाक वाला प्यारा सा बाल गीत तो है ही। लेकिन ये एक दुखद साइकिल गीत भी है। 

गाना शुरू होता है सुनील दत्त की साइक्लिंग से। वो पेंट, कोट और टाई धारण किए हुए हैं। एक खूबसूरत, चौड़ी और लगभग सुनसान शहरी सड़क पर एक हाथ से साइकिल चलाते हुए दिखाई देते हैं। उनके दूसरे हाथ में बहुत सारे उपहार हैं और पीठ पर ढेर सारे गुब्बारे भी बंधे हुए हैं। वो प्रसन्नतापूर्वक गुनगुनाते हुए साइकिल से घर की तरफ जा रहे हैं। उस कालखंड में हम सब के पिता ऐसे ही हंसते-मुस्कुराते, मेहनतकश सुपरमैन हुआ करते थे।




(बैकग्राउंड में पुरानी स्टाइल वाली इमारत, पुराने जमाने की लॉरी और उसके बोनट पर घात  लगाए बैठा मोटा ड्राइवर दिख रहा है। इसे सुपारी मिली है फिल्म में सुनील दत्त के ऊपर लॉरी चला कर मार डालने की। गाने के अंत में लॉरी सुनील दत्त के ऊपर चड़ा दी जाती है।)

उधर दूसरी तरफ उनके घर में जश्न का माहौल है। हम इस खुशी पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। बच्चे खूब खुश होकर गाना गा रहे हैं: 'बड़े भैया लाए हैं लंदन से छोरी। दिला दो हमें भी दुल्हन गोरी गोरी'! बहुत अजीब बात है। हमारे जैसे वृद्ध लोग बचपन को याद करते हुए मरे जा रहे हैं और इन बच्चों को देखो अभी से बड़ा होने चाहते हैं। बड़े नासमझ हैं, ये क्या चाहते हैं!?

बच्चों के इस गीत का एक-एक फ्रेम देखने लायक है। पुराने जमाने के खिलौने, वस्त्र, भाषा, माहौल सब कुछ बचपन के सुनहरे दिन याद करा देता है। गाने के फिल्मांकन में भी कोई लाग लपेट नहीं है। आज के गानों के समान इसमें  कुछ भी व्यवस्थित नहीं है और किस्मत से Choreography तो बिल्कुल भी नहीं है। बिल्कुल सरल और सहज फिल्मांकन है। और यही इसकी सादगी, विशेषता और सुंदरता है। इस प्यारे से 'सांवले सलोने' गीत के बोल तो ज़रा पढ़ लीजिए:

बड़े भैया लाए हैं, लंदन से छोरी।
दिला दो हमें भी दुल्हन गोरी गोरी। 2
दिला दो हमें भी दुल्हन गोरी गोरी।2
जोरू बिना आधे हैं हम जानेकब होंगे पूरे।
सब तो रचाएं शादी हम ही फिरे लंडूरे। 
जोरू बिना आधे हैं हम जानेकब होंगे पूरे।
सब तो रचाएं शादी हम ही फिरे लंडूरे
कहीं कर ना डालें हम दुल्हन की चोरी।
कहीं कर ना डालें हम दुल्हन की चोरी।
दिला दो  हमें भी दुल्हन गोरी गोरी।
दिला दो हमें भी दुल्हन गोरी गोरी।
बड़े भैया लाए हैं, लंदन से छोरी।
दिला दो हमें भी दुल्हन गोरी गोरी।2
फूलें जो दोनों गाल तो मुंह लाल हो गया।
अपना तो मारे रंज के यह हाल हो गया।
देखे कोई बारात तो हम रोएं ज़ार ज़ार।-3
दुल्हन का नाम सुन सुन के 
दिल होए  बेकरार-3
पड़ूं देखो अम्मा जी पैंया मैं तोरी।
दिला दो हमें भी दुल्हन गोरी गोरी।2
बड़े भैया लाए हैं, लंदन से छोरी।
दिला दो हमें भी दुल्हन गोरी गोरी।
दिला दो हमें भी दुल्हन गोरी गोरी।

छोटे बच्चों के गीत के हिसाब से शब्द कुछ बड़े-बड़े हैं। लेकिन तब ऐसे ही मजाकिए गाने पसंद किये जाते थे। सुनेंगे और देखेंगे तो आज भी ये गाना मनोरंजक ही लगेगा। 

मजरूह के लिखे  गीत के इस अंतरे पर आ जाइए: जोरू बिना आधे हैं हम ,जाने कब होंगे पूरे। सब तो रचाएं शादी, हम ही फिरे लंडूरे

इस अंतरे के शब्द लंडूरे पर भी थोड़ा विचार किया जाए। इस शब्द की उत्पत्ति पर चर्चा किए बगैर सीधे मतलब पर आते हैं। लंडूरा का  अर्थ 'बिना पूँछ वाला' या 'कटी हुई पूँछ वाला' पशु या पक्षी होता है। इस शब्द का उपयोग अकेले, असहाय, निगोड़े, आवारा और अविवाहित व्यक्ति के लिए भी किया जाता है। बताना तो नहीं चाहता था लेकिन आपसे भी क्या छुपाना: गंजों को भी कभी-कभी लंडूरा बोला जाता था!

हमारे बचपन में सिर्फ लड़के ही आवारा या लंडूरे कहलाते थे, लड़कियां नहीं। लंडूरी शब्द 'लंडूरी-फाख्ता' के रूप में अधिक इस्तेमाल होता था, जिसका अर्थ होता है असहाय या बेसहारा औरत। (फाख्ता मतलब Dove. हिंदी में बोलें तो कपोत, पँड़की, पंडुक, धवँरखा, डिउकी या सिर्फ छोटा कबूतर। Bird Family: Columbidae. )

स्कूल, कॉलेज और मोहल्ले में तो हम सब  छोरे लंडूरे ही थे। SGSITS 1983 बैच के कई लंडूरे दोस्तों को मिलाकर ये इमेज बनी है। सब ढूंढो इसमें अपने आप को! 

( यार वो लंडुरा कौन था जो हमेशा रबर की स्लीपर पहन कर कॉलेज आया करता था? और एक लंडुरा वो भी था जो पजामे के ऊपर बेल बॉटम पहन कर आ जाता था! पजामा नीचे से झांकता रहता था!)

भिया तुम भले ही कितने भी बड़े वाले नेता/अफसर/ ब्यूरोक्रेट/ कॉरपोरेट किंग/ शिक्षाविद/ टेक्नोक्रेट/ बिल्डर/  बिजनेसमैन/ NRI या सफल व्यक्ति हो गये हो और चाहे कितनी भी बड़ी गाड़ी में घूमते हो; हमारे लिए तो तुम सिर्फ एक साइकिल वाले लंडूरे ही रहोगे! न सिर्फ तुम्हारी शर्ट पर बल्कि तुम्हारे माथे पर भी  अमिट स्याही से लिखा हुआ है: लंडूरा!

इसे तुम मिटा नहीं सकते! इसलिए आओ, हमारे साथ साइकिल चलाओ, साइकिल/ तवा/ रेल संगीत  पढ़ो, सुनो, समझो और अगले पिछले ब्लॉग भी पढ़ते रहो; मज़ा आएगा! बचपना और जवानी तो बर्बाद कर ही चुके  हो अब बुढ़ापा तो संवार लो, लंडूरे कहीं के!


पंकज खन्ना 

9424810575

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