(12) हमको हंसते देख जमाना जलता है।

पंकज खन्ना
9424810575

               
साइकिल संगीत की अगली/पिछली ब्लॉग पोस्ट्स: 
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(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950) 3/9
(7) ओ साइकिल वाले बाबू ( अजीब लड़की 1950) 17/1
(8) आया रे आया रे आया रे भाजीवाला। तूफ़ान और दिया (1956) 31/1
(10) सांवले सलोने दिन आए बहार के। एक ही रास्ता (1956)14/2
(11) बड़े भैया लाए हैं लंदन से छोरी। एक ही रास्ता (1956)18/2

आज का गीत: हमको हँसते देख ज़माना जलता है।

गीत: हमको हँसते देख ज़माना जलता हैगाने के बोल: इस लिंक को दबाएं।फिल्म: हम सब चोर हैं (1956)। गायक: रफ़ी और जी एम दुर्रानी। गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी, संगीतकार: ओ पी नैयर।पर्दे पर: आई एस जौहर और मजनू।

आज के गीत में फिर एक बार जुड़वां साइकिल ( Tandom Cycle) दिखाई देगी। इसके पहले आप साइकिल संगीत के ब्लॉग पोस्ट   एक दिन लाहौर की ठंडी सड़क पर और सांवले सलोने दिन आए बहार के में भी आप जुड़वां साइकिल का उपयोग देख चुके हैं।

फिल्म में आइ एस जौहर और मजनू को चोर बताया गया है। दोनों चोरी करके पुलिस वालों से डरकर भाग रहे हैं। सबसे पहले ये दोनों चोर लंगोटीवाले/ धोती वाले बाबा बनकर हाथ में चिमटा लेकर सड़क पर नाच गाना करते हैं: हमको हँसते देख ज़माना जलता है। ये तो शाश्वत सत्य है जी, आज भी।

पुलिस को आता देखकर वो भीड़ में से एक कपल की टेंडम साइकिल चुराकर आराम से इसे चलाते हुए निकल लेते हैं। भीड़ देखती है और कुछ नहीं करती। डायरेक्टर का आशीर्वाद जो था इनपर। इनका गाना बजाना साइकिल पर भी जारी रहता है। 


थोड़ी देर में पुलिस के दो ठुल्ले भी टेंडम साइकिल पर इनका पीछा करना शुरू कर देते हैं। पुलिस और टेंडम साइकिल!? हां भिया दो ठुल्ले टेंडम साइकिल पर! यहीं दिखेंगे! ऐसे!👇


ठुल्लों से बचकर दोनों चोर किसी मंदिर के बाहर भजन/ भोजन के लिए पसर जाते हैं। ठुल्ले नकली दाढ़ी पकड़ लेते हैं। दाढ़ी हाथ में आ जाती है लेकिन चोर नहीं!


भागम भाग जारी है। दोनों भागकर एक कार की डिक्की में घुस जाते हैं और ऐसे कातिलाना पोज़ देते हैं:

'पीछा करो' अभी भी चले जा रिया है। एक इंपोर्टेड कार जिसे जवान फिरोज खान चला रहे हैं, 'इंडियन आर्ट पैलेस' पर रुकती है। 





फिराक में बैठे दोनों चोट्टे इस कार को लेकर रवानगी डाल देते हैं। फ़िरोज़ खान और उनकी सेटिंग देखते रह जाते हैं। गाना खतम हो जाता है। आगे क्या हुआ? फिल्म देखी होती तो बताते!

थोड़ी सी बात कैरेक्टर आर्टिस्ट मजनू (1913 -1975) की भी कर लेते हैं। रेल संगीत के  ब्लॉग पोस्ट चल मेरी गडीये में भी  आप मजनू को मीरा  शौरी और कौशल्या के साथ देख चुके हैं। इन्होंने  मिलकर पूरी ट्रेन का ही अपहरण कर लिया था! ना भूतो न भविष्यति! याद आया!? ये रहा लिंक फिर से एक बार!

मजनू का असली नाम था: Harold Lewis. मजनू पंजाबी फिल्मों के प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, स्क्रीनराइटर और कॉमेडियन थे। उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी कॉमेडीयन के रोल किए। उनके द्वारा की गई कुछ हिंदी फिल्में ये हैं : एक थी लड़की, भागम भाग, हम सब चोर हैं और सन ऑफ़ अली बाबा। 

पंजाबी सिनेमा में, वह पहले ऐसे कॉमेडियन थे जो अपनी शानदार एक्टिंग से किसी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर सफल बना सकते थे। उदाहरण के लिए देखें उनकी पंजाबी  फिल्म पोस्ती जिसमें उनके साथ श्यामा भी हैं।

अंत में आज के गीत के मुखड़े पर फिर लौट आते हैं। चोरों के मुख पर  तो नहीं लेकिन आमजन के लिए ये  मुखड़ा बहुत जँचता है: हमको हँसते देख ज़माना जलता है।

अगर संत  कबीर के जमाने में आज के गीत का मुखड़ा आया होता तो वो शायद बहुत बेहतरीन लिख जाते इस भावार्थ के साथ:

हँसत मुख  देख कर, जग में उठी जलन।
भीतर जिनका शून्य है, बाहर करें दहन।।
 
हमको हंसते देख कहत कबीर सयाना।
जलता है, जलने दो ये जालिम जमाना।।

जिनको हँसी चुभे , खोजें वो दोष विकार।
दर्पण में जो देख लें, मिट जाए अंधकार।।

अधिकतर लोग  काया पे  अटके हैं और माया में भटके है। जाने दो इनको! आप तो अंतर्मन से हंसिए, गाइए, नाचिए, साइकिल चलाइए, उत्सव मनाईए: अकेले या लोगों के साथ! आखिर ज़िन्दा हैं आप!



पंकज खन्ना 

9424810575

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