(19) माना जनाब ने पुकारा नहीं।

पंकज खन्ना
9424810575

               
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(1) साइकल संगीत-परिचय (3/6/2025)
(2) सावन के नज़ारे हैं। (खजांची 1941) 15/8
(3) ओ दूधवाली ग्वालनिया (सीधा रास्ता 1947) 23/8
(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950) 3/9
(7) ओ साइकिल वाले बाबू ( अजीब लड़की 1950) 17/1
(8) आया रे आया रे आया रे भाजीवाला। तूफ़ान और दिया (1956) 31/1
(10) सांवले सलोने दिन आए बहार के। एक ही रास्ता (1956)14/2
(11) बड़े भैया लाए हैं लंदन से छोरी। एक ही रास्ता (1956)18/2
(12) हमको हँसते देख ज़माना जलता है।हम सब चोर हैं। (1956) 21/2
(16) जवानियां ये मस्त मस्त। तुमसा  नहीं  देखा(1957) 21/3


आज का गाना: (19) माना जनाब ने पुकारा नहीं।


गानामाना जनाब ने पुकारा नहींफिल्म:  पेइंग गेस्ट (1957)। गायक: किशोर कुमार। गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी।  संगीतकार: एस डी बर्मन। पर्दे पर: देव आनंद और नूतन। गाने के बोल।  फिल्म के सभी गाने


 

गाना देख लिया ना!? आप जानते हैं, हमने कभी ऐसे किसी लड़की का साइकिल पर पीछा किया होता और ऐसे ही गाना गाया होता तो हाथ पैर तुड़वा लिए होते और अंदर हो गए होते। अफसोस है ऐसा किया नहीं! पिट जाते और अंदर भी हो जाते तो क्या!? अनुभव तो होता, किस्सा तो बनता! ये नासपीटा जीवन कोरा कागज ही रह गया!

पर साइकिल चलाते हुए ऐसा गाने का सोचा बहुत सालों तक! वक्त वक्त की बात है, अब तो साइकिल चलाते ही कबीर के भजन याद आने लगते हैं!

आप कबीर के भजन सुनने पढ़ने तो नहीं आते हैं इस ब्लॉग पर! तो चलो पर्दा उठाते हैं, कोरे कागज वाले जीवन में रंग भरते हैं, ब्लैक एंड व्हाइट से! शायद दिख ही जाएं आपको!



हमें तो अब तक के कवर किए गए सभी 19 साइकिल गीत बहुत पसंद हैं। सभी एक से बढ़कर एक हैं। बहुत मेहनत करके इन गानों को एक साथ पिरोया है। अच्छे तो लगेंगे ही क्योंकि ये आपकी और हमारी कहानी जो कहते हैं। तवा संगीत आपको भले ही सिर्फ हमारा लगे, साइकिल संगीत तो आपका भी है भिया!

अगर इन 19 गानों  में से कोई एक साइकिल गीत चुनने के लिए सर्वे किया जाए तो शायद आज के गाने को सर्वाधिक वोट मिलेंगे। 



मिलें भी क्यों नहीं, आखिर ये गीत है ही  बहुत अधिक लोकप्रिय, आज भी। देव आनंद, एस डी बर्मन और किशोर कुमार की जबरदस्त तिकड़ी का एक शानदार नगीना है। उनके सार्वकालिक अच्छे गीतों में से एक माना जा सकता है।

कुछ बातें गाने के फिल्मांकन की कर ली जाएं। एक सुंदर बगीचा है जिसमें एक छोटा प्यारा सा पुल है। पुल से सलवार, पूरी बांह का कुर्ता और चुन्नी पहने नूतन कुछ रूठे हावभाव के साथ पैदल जा रही हैं।

उनके हाथ में बैडमिंटन का रैकेट है, जो बैडमिंटन वाले साइकिल गीत हो लाख मुसीबत रस्ते में की याद दिलाता है। देव आनंद हाथ से  साइकिल घसीटते हुए नूतन के पीछे-पीछे  जा रहे हैं। 

एस डी बर्मन ने उनकी जादू की पाइपलाइन धीरे से खोल दी है। संगीत हौले हौले बगीचे में फैल गया है, रंग बिरंगे फूलों की खुशबू के साथ। नूतन तेज गति से आगे निकलती हैं तो देव आनंद भी एक्शन में आ जाते हैं। मतलब, साइकिल चलाने लग जाते हैं और फिर से नूतन को घेर लेते हैं। एस डी बर्मन का जादुई संगीत अविरल बहता जा रहा है। और ये भाई गाते जा रहे हैं: माना जनाब ने पुकारा नहीं। क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं

दोनों  पेड़ों के आसपास घूमते हैं, पुल के नीचे से भी निकलते हैं और थोड़ी देर बाद बगीचे के बाहर आ जाते हैं। बाहर आकर नूतन पलक झपकते ही  देव आनंद की 'जेंट्स साइकिल' चलाकर निकल जाती हैं। देव आनंद देखते रह जाते हैं। 

( पारो ने कुछ दिन पहले ही बताया था कि उसकी नानी 'पूना' के फर्गुसन कॉलेज में सन 1935 में सहेलियों के साथ साइकिल पर जाती थीं। हमने आश्चर्य प्रकट किया: 1935 में पूना में लड़कियां कॉलेज में और वो भी साइकिल पर!?

तो पारो ने गर्व से बताया कि पारो की नानी तो नानी के पिताजी की जेंट्स साइकिल पर कॉलेज जाया करती थीं! हमने इंदौरी स्टाइल में घोर आश्चर्य प्रकट किया: एं!? 

फिर उन्होंने आगे भेद खोलते हुए बताया कि उनकी नानी की बड़ी वाली बहन साड़ी पहनकर जेंट्स साइकिल चलाकर किसी अंग्रेज कंपनी में नौकरी करने जाती थीं, पूना में!

अब अगर नूतन जेंट्स साइकिल चला भी लें तो भी पारो की नानी या पारो की नानी की बहन का क्या मुकाबला करेंगी!? पारो, पारो की नानी, पारो की नानी की बहन और पुणे की लड़कियों के साइकिल चलाने के विषय पर थोड़ी और चर्चा होगी अगले के अगले ब्लॉग पोस्ट में एक सुंदर साइकिल गीत के साथ! ठीक है पारो!?)

पारो को छोड़ कर फिर 'चंद्रमुखी' नूतन की ओर चलते हैं। क्योंकि  गाना अभी भी चल्लिया है! देव आनंद एक मोटू की साइकिल छीन कर नूतन का पीछा शुरू कर देते हैं और जल्दी ही उन्हें पकड़ लेते हैं। रोमांस, गाना और संगीत अब सड़क पर  आ जाता है! देव आनंद अंतरा गाते हैं: माशाअल्ला कहना तो माना...!  थोड़ी देर बाद फिर धीरे से गाने का 'हैप्पी एंड' हो जाता है।

अफसोस, ये गाना सिर्फ चार मिनट का ही है! बहुत नाइंसाफी है ये। जब ऐसी तिकड़ी और नूतन साथ में हों तो गाना कम से कम 10 मिनिट का होना चाहिए! सहमत हों तो एक बार और सुन लीजिए; गाना आठ मिनट का हो जाएगा: माना जनाब ने पुकारा नहीं। क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं

इधर हम लिख रहे हैं उधर 'जनाब' पुकार लगा रहे हैं। Maths में आप x, y आदि मान सकते हैं। लेकिन गृहस्थी में ऐसा  नहीं मान सकते: माना, जनाब ने पुकारा नहीं! 

पुकारा है, तो जाना ही पड़ेगा! नहीं तो सुनना पड़ेगा: क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं!?

जल्दी लौट आयेंगे और एक जबरदस्त साइकिल गीत के साथ।  आज World Health Day है। पार्टी/शार्टी गई भाड़ में, आप तो  साइकिल चलाओ आड़ में।

गाने जीवन में सतत् बजते रहें:)

 

पंकज खन्ना 

9424810575


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