(13) चले बजाते सीटी जीवन की राहों में।
पंकज खन्ना
9424810575
साइकिल संगीत की अगली/पिछली ब्लॉग पोस्ट्स:
(1) साइकल संगीत-परिचय (3/6/2025)
(2) सावन के नज़ारे हैं। (खजांची 1941) 15/8
(3) ओ दूधवाली ग्वालनिया (सीधा रास्ता 1947) 23/8
(4) ए मोहब्बत उनसे मिलने ( बाजार 1949) 29/8
(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950) 3/9
(6) एक दिन लाहौर की ठंडी (सगाई 1951) 10/9
(7) ओ साइकिल वाले बाबू ( अजीब लड़की 1950) 17/1
(8) आया रे आया रे आया रे भाजीवाला। तूफ़ान और दिया (1956) 31/1
(9)देखी-देखी पंछी, देखी ये फुलवारी। जलदीप (1956) 7/2
(10) सांवले सलोने दिन आए बहार के। एक ही रास्ता (1956)14/2
(11) बड़े भैया लाए हैं लंदन से छोरी। एक ही रास्ता (1956)18/2
(12) हमको हँसते देख ज़माना जलता है।हम सब चोर हैं (1956) 21/2
(13)आज का गीत: चले बजाते सीटी, जीवन की राहों में। धीरे धीरे प्यार की धुन हम छेड़ें।
गीत: चले बजाते सीटी, जीवन की राहों में। फिल्म: ज़माना (1957) गायक: अनिल बिस्वास। गायिका: आशा भोंसले। गीतकार: प्रेम धवन। संगीतकार: अनिल बिस्वास। पर्दे पर: अमिता (जन्म नाम कमर सुल्ताना) और कमलजीत ( असली नाम शशि रेखी, वहीदा रहमान के पति)। गाने के बोल: लिंक। फिल्म ज़माना के सभी गानों का लिंक।
जवान प्रेमी लड़के लड़कियों द्वारा शहर से दूर सूने गाँव/जंगल के रास्तों में साइकिल यात्रा के दौरान प्रसन्नता से कभी साइकिल की घंटी बजाना और कभी मुँह से सीटी ( Whistle) मारना! बस यही है साइकिल गीत का सर्वोच्च संगीतमय आनंद। साइक्लिंग की साइक्लिंग, संगीत का संगीत!
हिंदी फिल्म में मुँह से सीटी का प्रयास सबसे पहले फिल्म खजांची (1941) के गीत सावन के नज़ारे हैं में किया गया था। और यही गीत सबसे पहला साइकिल गीत भी था। इस गीत के बारे में हम काफी चर्चा पहले ही कर चुके हैं।
उस दौर में साइकिल चलाने के साथ गाते हुए सीटी बजाना एक आम बात थी। लेकिन फिर भी बहुत ही कम साइकिल गीत ऐसे बने हैं जिनमें सीटी का भी प्रयोग किया गया हो।
अमिता और कमलजीत पर फिल्माया गया यह गीत जीवन में प्रेम, आनंद और उल्लास के भाव को सुंदर ढंग से दर्शाता है। और ये भी पहले साइकिल गीत ( सावन के नज़ारे हैं ) के समान ही एक साइकिल गीत होने के साथ-साथ सीटी गीत भी है।
प्रेम धवन के लिखे इस गीत में थोड़ी दार्शनिकता की झलक भी है: चले बजाते सीटी, जीवन की राहों में। मतलब साफ है जीवन की कठिनाइयों का सामना हंसते हंसते करें।
ये खूबसूरत प्रेम-गीत साइकिल की घंटी और गोल मुँह करके बजाई गई सीटी का मधुर, अति मधुर, मिश्रण है। सीटी और साइकिल की घंटियों की मीठी धुन इस गाने में और भी माधुर्य भर देती है। इतना माधुर्य कि ब्लैक एंड व्हाइट गाने में भी रंग दिख जाएं!
सुनिये और देखिए तो सही! कानों में मिश्री घुल जाएगी, आँखों में प्यार और दिमाग में मस्ती छा जाएगी! गाने के बोल इस लिंक से पढ़ भी सकते हैं।
आशा भोसले की चपल, चंचल और भावपूर्ण गायकी तथा गायक अनिल बिस्वास के गले की गहराई व सादगी मिलकर गीत को 'घरेलू' और जीवंत बना देते हैं। संगीतकार अनिल बिस्वास का संगीत तो हमेशा के समान कर्णप्रिय और मधुरम है ही। रेल संगीत में हम पहले भी अनिल बिस्वास के गाए गीत ( आया आया रे बंबई वाला) के बारे में चर्चा कर चुके हैं।
आओ अब सिर्फ सीटी की ही बात कर लें।हमारे बचपन में सिर्फ गंदे बच्चे सीटी बजाया करते थे। इसलिए इच्छा होती थी सीटी मारने की! लेकिन घर, मोहल्ले और स्कूल में सीटी बजाना वर्जित था! किशोरावस्था प्राप्त करने के बाद नेहरू स्टेडियम और आस पास के मैदानों में हमें विभिन्न प्रकार की सीटियों बजाने की ट्रेनिंग मोहल्ले के बड़े लड़कों ने दी। आज भी शुक्रगुजार हैं मोहल्ले के भी और प्रिय सीनियरों के भी! वर्ना आज नल्ले ही कहलाते!
गोल मुँह करके सीटी बजाना यानी Whistling तो हर इंसान को ईश्वर की देन है । और ये Whistling किसी संगीत उपकरण पर आश्रित नहीं है। आप जहां चाहें वहां गाते-गाते संगीत उत्पन्न कर सकते हैं; भले ही कर्कश हो;)
भगवान ने ये संगीत उपकरण सभी को दिया है। बस हम मनुष्य ही विचित्र प्रजाति के हैं कि संगीत हो, संगीत उपकरण हों या खुशियाँ; सब कुछ बाहर ही ढूंढते हैं, अंदर कुछ नहीं।
(कबीर सैकड़ों साल पहले कह गए हैं: मोको कहाँ ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास में। भ्रमित या अवसाद ग्रसित लोगों को कबीर वाणी सुन लेना चाहिए। सारे दुःख दर्द भूल जाएंगे। कारण, साहेब न धनी हैं, ना ज्ञानी हैं, न शिक्षित हैं और न ही सुसंस्कृत! बस दिल, दिमाग, करुणा और तर्क में सशक्त थे। उन्होंने कभी स्वयं को भगवान का दर्जा नहीं दिया। वो बस भगवान के भेजे हुए माटी के विशिष्ट पुतले हैं। इनकी बंदगी आनंद से भर देती है। कर के देखें! बुझे दिल को भी करार आ जाता है।)
पुरानी आदत है, बचपन से। साइकिल चलाते-चलाते मेन रोड छोड़कर दाएं बाएं गलियों में 'उनके दीदार' के लिए घुस जाना! उमर हो गई, अब 'उनकी गली' में जाकर क्या करेंगे? अब बस कबीर की गली अच्छी लगने लगी है! लेकिन वापिस आते हैं सीटीबाजी और साइकिल पर; मेन रोड तो यही है!
कबीर को याद करेंगे, साइकिल चलाएंगे, सीटी भी बजाएंगे और ब्लॉगिंग भी करेंगे! हम तो ऐसे ही जिएंगे! वो क्या कहते हैं आजकल के लौंडे!? हां, बस वही! Its my life!!
सीटी बोले तो मस्ती, खुशी और बेफिक्री का प्रतीक। जैसे पक्षी खुश होने पर चहचहाते हैं, हम इंसान अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए सीटी बजाते हैं। फिल्म संगीत में सीटियों ( Whistling) का महत्व कभी कम नहीं हुआ। आज भी बहुत से गानों में Whistling सुनाई देती है। Whistling के साथ हिंदी फिल्मों में सैकड़ों गाने अवश्य होंगे। आज कुछ बेहतरीन सीटी गीत (जरूरी नहीं है कि वो साइकिल गीत भी हों) जो 40 और 50 के दशक के हैं उन्हें ट्रेलर के रूप में लिख भर लेते हैं। आप चाहें तो लिंक दबाकर देख भी सकते हैं:
(1) ब्लॉग लिंक: सावन के नज़ारे हैं।: खजांची (1941)। सिर्फ गाने का लिंक।
(2) बेदर्द को बुलावो सीटी बजा बजा के।कारवां (1944): इस गाने को सुनना अनिवार्य है!
(3) शाम ढले खिड़की तले- अलबेला (1951)
(4) जाने ना नज़र -आह(1953)
(5) नखरेवाली- न्यू डेल्ही (1956)
(6) चले बजा के सीटी, जीवन की राहों में। ज़माना (1957) आज का ब्लॉग पोस्ट।
(7) आँखों में क्या जी:नौ दो ग्यारह (1957)
(8) हम हैं राही प्यार के : नौ दो ग्यारह(1957)
(9) हम पंछी मस्ताने: देख कबीरा रोया (1958)
(10) है उनकी वो निगाहें :आखिरी दांव (1958)
(11) ये क्या कर डाला तूने :हावड़ा ब्रिज (1958)
(12) किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार : अनाड़ी(1959)
तो ये हुए कुछ प्रसिद्ध, कुछ कम सुने सीटी वाले पुराने गाने। सभी एक से एक छठे हुए, बिल्कुल हमारे दोस्तों के समान! ('हमारे' शब्द में थोड़ी सी मात्रा की गलती हो गई है। र और म की भी अदला बदला हो गई है! सॉरी!!)
साठ के दशक में और उसके बाद के दशकों में भी बहुत शानदार सीटी वाले सैकड़ों गाने बने हैं। जब भी अगला साइकिल गीत सीटी के साथ आएगा, हम सीटी वाले कुछ चुनिंदा गाने याद करेंगे साइकिल संगीत में ही।
बहुत बज गया आपके और हमारे जीवन का बैंड! प्रभु से प्रार्थना है कि अब शेष जीवन में साइक्लिंग के साथ साइकिल की घंटी और अंतर्मन की सीटी सतत् बजती रहे!
पंकज खन्ना
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