(17) आहा बदला ज़माना, वाह वाह बदला ज़माना (1957)
पंकज खन्ना
9424810575
साइकिल संगीत की अगली/पिछली ब्लॉग पोस्ट्स:
(1) साइकल संगीत-परिचय (3/6/2025)
(2) सावन के नज़ारे हैं। (खजांची 1941) 15/8
(3) ओ दूधवाली ग्वालनिया (सीधा रास्ता 1947) 23/8
(4) ए मोहब्बत उनसे मिलने ( बाजार 1949) 29/8
(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950) 3/9
(6) एक दिन लाहौर की ठंडी (सगाई 1951) 10/9
(7) ओ साइकिल वाले बाबू ( अजीब लड़की 1950) 17/1
(8) आया रे आया रे आया रे भाजीवाला। तूफ़ान और दिया (1956) 31/1
(9)देखी-देखी पंछी, देखी ये फुलवारी। जलदीप (1956) 7/2
(10) सांवले सलोने दिन आए बहार के। एक ही रास्ता (1956)14/2
(11) बड़े भैया लाए हैं लंदन से छोरी। एक ही रास्ता (1956)18/2
(12) हमको हँसते देख ज़माना जलता है।हम सब चोर हैं। (1956) 21/2
(13) चले बजाते सीटी, जीवन की राहों में। जमाना(1957) 28/2
(14) बच के बलम चल कि रास्ता है मुश्किल। जॉनी वॉकर(1957) 7/3
(15) हो लाख मुसीबत रस्ते में। प्यासा (1957) 14/3
(16) जवानियां ये मस्त मस्त। तुमसा नहीं देखा(1957) 21/3
(17) आहा बदला ज़माना वाह वाह बदला ज़माना। मिस इंडिया (1957) 28/3
(19) माना जनाब ने पुकारा नहीं। पेइंग गेस्ट (1957)। 7/4
(20) छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा। (1957) पेइंग गेस्ट।11/4
आज का गाना: (17) आहा बदला ज़माना वाह वाह बदला ज़माना (1957) मिस इंडिया।
गाना: आहा बदला ज़माना वाह वाह बदला ज़माना। फिल्म: मिस इंडिया (1957)। गायक: रफ़ी। गीतकार: राजिंदर कृष्ण। संगीतकार: एस डी बर्मन। पर्दे पर: आई एस जौहर: अभिनेता/ पटकथा लेखक/ निर्देशक। गाने के बोल। फिल्म के सभी गाने।
आज के साइकिल गीत में हीरोइन नहीं है। फिर भी गाने में पुराने जमाने का जादुई आकर्षण है। और थोड़ा सा जीवन के लिए आवश्यक 'मैथ्स' भी है इसमें। गणित प्रेमियों के लिए गणित ही हीरोइन है। इस हीरोइन की बात गाना खतम होने के बाद!
गाने में फिल्म की कहानी की मांग के अनुसार आई एस जौहर अलग-अलग रूप में दिखाए गए हैं जैसे शिक्षक, विकलांग साइकिल चालक और भिक्षुक।
गाने की शुरुआत में इन्हें टोपी और छड़ी वाले शिक्षक के रूप में दिखाया गया है। वो बच्चों को गा-गा कर बता रहे हैं कि अंग्रेजों के जमाने की पुरानी 'आने और पाई' वाली मुद्रा (जो असल में मुग़लों के समय से चली आ रही थी) को नए भारत के नए पैसे वाली मुद्रा में कैसे बदलें। बच्चे हिल-हिल कर, डुल-डुल कर प्रसन्नावस्था में गा रहे हैं और 'पारंपरिक शिक्षा प्रणाली' के अनुसार रट्टा मार रहे हैं। साइड में बेंच-कुर्सी पर कुछ और लोग (शायद शिक्षक) भी मस्त मुस्कुराते हुए, दाएं-बाएं हिलते हुए आनंद ले रहे हैं। देखो तो!
दूसरे दृश्य में बच्चे और उनके शिक्षक समुद्र किनारे चौड़ी- चौड़ी लेकिन खुली और खाली सड़कों पर साइकल चलाते हुए यही गीत गाते हैं। शायद बंबई के मरीन ड्राइव का दृश्य है। क्या जमाना रहा होगा, साइकिल चलाने के लिए! एस डी बर्मन की धुन, साइक्लिंग, विद्यार्थी, समुद्री किनारा, शहर के बीच में फिर भी भीड़ से दूर! हमारी पीढ़ी के नसीब में कहां ऐसा मंजर! बस यू ट्यूब पर गाना देख लिया, ब्लॉग लिख रहे हैं!
ब्लॉग लिखते-लिखते बस ऐसा लग रहा है कि रिटायरमेंट को रिटायर करके फिर से एक्शन में आ जाएं और बच्चों को फिर से CAT के लिए पढ़ाना शुरू कर दें: Love Thy Numbers और Love Thy Squares.
लेकिन फिर आपके लिए ब्लॉग कौन लिखेगा!? आप दिन भर रीलें देखकर अपना बचा खुचा जीवन भी बर्बाद कर देंगे! आपके जीवन को बचाने के लिए ब्लॉग लिखना बहुत ज्यादा जरूरी हो गया है;)
आप तो बस देखिए गाने में शिक्षक आई एस जौहर कैसे तीन पहिए की साइकिल चलाते और गाते हुए दिखाई देते हैं। ये तीन पहिए वाली विकलांग साइकिल पर फिल्माया गया शायद एकमात्र गीत है।
कुल मिलाकर इस सुमधुर गाने ने देश के नागरिकों को आना और नए पैसे का भेद समझाने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की। आप भी सुन लें और समझ लें आना, पाई और नए पैसे के बारे में। अगर आप यह जानना चाहते हैं कि 1957 का भारत कैसे सोचता था और कैसा दिखता था तो रफी की सरल आवाज और एस डी बर्मन की मीठी धुन में इस गीत को सिर्फ सुनें ही नहीं देखें भी।
(गाने में कुछ मैथ्स की और ब्लॉग में अन्य गलतियां भी हो सकती हैं। कृपया नजरअंदाज़ कर दें। बिल्कुल वैसे ही जैसे आप अपने मटके वाली तोंद को दशकों से अनदेखा करते आए हैं!)
पुराने जमाने में कैलकुलेटर तो नहीं होते थे लेकिन हमसे पहले पीढ़ी वाले लोग कितनी आसानी से रुपए-आने-पैसे-पाई की नई पुरानी गणनाएं चुटकियों में कर लिया करते थे। तब बहुत सी वस्तुओं की कीमतें इन चारों अवयवों से बनती थी। उदाहरण के लिए: 2 रूपये, 3 आने, 4 पैसे और दो पाई। आज हमें सिर्फ रुपए का ही हिसाब रखना होता है। सोचिए वो कैसे कर लेते थे ये गणनाएं इतनी आसानी से!
उस समय के लोगों के पास सूचना का अभाव जरूर रहा होगा लेकिन बौद्धिक संपदा और तीक्ष्णता की बिल्कुल कमी नहीं थी। आज हमारे पास बहुत सूचनाएं अवश्य हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि हम पिछली पीढ़ी से अधिक बुद्धिमान हैं। सच तो ये है कि हम में से अधिकतर लोग बगैर कैलकुलेटर ( AI का पूर्वज) के कोई गणना ही नहीं कर सकते हैं और अपने आप को अत्यधिक बुद्धिमान समझते हैं!
आपको बताते चलें कि भारत सरकार ने देश के स्वतंत्र होने के लगभग 10 साल बाद 1 अप्रैल, 1957 को नई मुद्रा व्यवस्था शुरू की थी। हम आजाद हो गए थे लेकिन फिर भी दस सालों तक सिक्का अंग्रेजों का ही चलता था।
आज एक अच्छा मौका मिला है। एक बार पुरानी मुद्रा प्रणाली को संक्षेप में समझ लेते हैं:
1 रुपया = 16 आना
1 आना = 4 Pice ( पुराने पैसे)
1 पुराना पैसा = 3 पाई
कुल मिलाकर
1 रुपया = 16 आना = 64 पैसे = 192 पाई।
ये मुद्रा Decimal System ( Base 10) की ना होकर Base 16 के अनुसार चलती थी। नई पद्धति में इसे Decimal System (दशमलव प्रणाली) में परिवर्तित कर दिया गया और एक रुपया 100 नए पैसे के बराबर हो गया। और एक आना 6.25 पैसे के बराबर। लेकिन व्यवहारिक गणना में इसे 6 पैसे के बराबर मान लिया जाता था, जैसा कि आपने इस गाने में सुना।
पुरानी मुद्रा पद्धति में सिक्कों के नाम कुछ ऐसे होते थे: पाई, पईसा (पुराना पैसा), अधन्ना ( आधा आना) , आना, इकन्नी ( एक आना), दुअन्नी (दो आना), चवन्नी (चार आना) और अठन्नी ( आठ आना)।
नई व्यवस्था में पच्चीस नए पैसे का सिक्का बन गया नई चवन्नी और पचास नए पैसे का सिक्का बन गया अठन्नी।
पाई की कीमत लगभग आधा पैसे के बराबर होती थी। ( 192 पुरानी पाई= 100 नए पैसे; मतलब एक पाई =0.5208 नए पैसे ) पाई की कीमत नगण्य हो जाने से इसे प्रचलन से शीघ्र ही बाहर कर दिया गया था। लेकिन आज भी 'पाई पाई का हिसाब' रखना समझदारी है।
अप्रैल 1957 से, ये 'आने' वाले सिक्के तो जाने वाले हो गए लेकिन कुछ सिक्कों के नाम आज भी मुहावरों और कहावतों में प्रयोग में लाए जाते हैं। इनमें से सबसे अधिक प्रयोग में आनेवाला शब्द है: चवन्नी! चवन्नी से संबंधित कुछ मुहावरे, कहावत और वाक्यांश इस प्रकार हैं:
चवन्नी छाप: तुच्छ, साधारण या कम महत्व का व्यक्ति।
चवन्नी-भर : बहुत कम या तुच्छ मात्रा ,चौथाई के बराबर।
चवन्नी चोर: छोटा मोटा चोर, उठाईगिरा।
चवन्नी की औकात न होना: बहुत कम इज्जत या मूल्य होना।
चवन्नी न देना : फूटी कौड़ी देने से भी इंकार कर देना, कंजूसी करना।
जब देश में इंदिरा गांधी का सिक्का चलता था तो देश की जनता चुनाव के पहले ये नारा लगाती थी: खरी चवन्नी चांदी की जय बोलो इंदिरा गाँधी की। लेकिन आपात काल के बाद हुए चुनाव में जनता ने ही ये नारा भी दिया था: चार चवन्नी थाली में, इंदिरा गांधी नाली में।
कुछ छोटे बच्चों के घर का नाम ही चवन्नी होता था। बड़े बच्चे खुद अठन्नी कहलाते थे लेकिन छोटे बच्चों को चवन्नी कहकर बुलाते थे।
तवा संगीत में हम देश की प्रथम संगीत स्टार गौहर जान के बारे में बातें कर चुके हैं। (और जानने के लिए ये ब्लॉग पढ़ सकते हैं: मेरे हजरत ने मदिने में मनाई होली।) गौहर जान की दो शिष्याएं थीं और उनके नाम थे: चवन्नी और दुअन्नी! बाद में ये भी गायिकाएं बनीं और कहलाईं : चवन्नी जान और दुअन्नी जान! इनके गानों के तवे भी बने हैं।
शायद आपने नसीराबाद के प्रसिद्ध कचौड़े के बारे सुना होगा। इनके निर्माता का नाम है: चवन्नीलाल हलवाई। बड़ी से बड़ी कचोरी भी अगर इस कचौड़े के साथ रख दी जाए तो बिल्कुल चवन्नी दिखती हैं।
चवन्नी और फिल्मी गानों का बहुत पुराना रिश्ता रहा है। रसिक सिने प्रेमी एक रूपये साठ पैसे का स्टाल का टिकट खरीदकर आगे-आगे बैठकर पसंद के गानों पर सीटियां बजा बजाकर चवन्नियां लुटाया करते थे। ये गाने कभी चवन्नी छाप नहीं कहलाए लेकिन ऐसे दर्शकों को बालकनी में बैठे 'भद्रलोग' चवन्नी छाप ही बोला करते थे।
चवन्नी या 25 पैसे का सिक्का 1 जुलाई 2011 को प्रचलन से बाहर कर दिया गया। एक पैसा ,दो पैसे, तीन पैसे, पंजी (पांच पैसे का नया सिक्का), दस्सी ( दस पैसे का नया सिक्का) और बीस पैसे के सिक्के भी चवन्नी के साथ रिटायर हो गए और उन सबकी वैल्यू कई गुना बढ़ गई!
( समझे!? रिटायर्ड लोगों की इज्जत किया करो! बहुत मूल्यवान होते हैं;)
अब ना तो चवन्नी रही न ही वो सिनेमा के आधार स्तंभ याने चवन्नी छाप दर्शक। इसी लिए अब हमें आजकल की फिल्मों में चवन्नी भर दिलचस्पी भी नहीं है।
बहुत हुई चवन्नी बातें! अठन्नी पर विचार किया जाए। पैसे के नाम पर अब सिर्फ पचास पैसे का सिक्का यानी अठन्नी आधिकारिक रूप से मान्य है। अठन्नी पर एक मुहावरा आपको याद भी होगा: आमदनी अठन्नी, खर्च रुपय्या!
पैसे से संबंधित कुछ और मुहावरे ये भी हैं:
हिसाब भाई-भाई का रुपये-आने पाई का;
सोलह आने सच, सिक्का चलना,
नौ नकद न तेरह उधार, दाम बनाये काम, पैसे पेड़ पर नहीं उगते, चमड़ी चली जाये पर दमड़ी न जाये...। लिस्ट बहुत लंबी है, आगे भी जिक्र होगा।
अंत में पुनः आज के गीत पर नज़र डालते हैं। इस गीत में परिवर्तन को बहुत आशावाद, स्वागत और हर्ष के साथ स्वीकार किया गया है। आज के बड़े-बूढ़ों के लिए बहुत अच्छा संदेश है इसमें।
अक्सर बड़े-बूढ़े नए जमाने को कोसते नजर आते हैं। उनको नए जमाने और नौजवानों से बहुत सी शिकायत होती हैं। वो नहीं बदलते लेकिन ज़माना तो लगातार बदलता रहता है। मेरे सभी सठिया गए दोस्तों स्मरण रहे: बदलते जमाने को दिल से स्वीकार करने में ही भलाई है!
हम स्वयं बदलें या ना बदलें, ऊपरवाला हमारी बदली कभी भी इस दुनिया से कहीं दूर कर सकता है। जानते हैं ना!? तो बस बची उम्र में बार-बार 'आहा' और 'वाह -वाह' कहिए और आनंद लीजिए बदले जमाने का!
गाने का मुखड़ा गाइए, खुश हो होकर: आहा बदला ज़माना वाह वाह बदला ज़माना।
पंकज खन्ना
9424810575
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