(2) सावन के नज़ारे हैं।
पंकज खन्ना
9424810575
साइकिल संगीत की अगली पिछली ब्लॉग पोस्ट्स:
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(2) सावन के नज़ारे हैं। (खजांची 1941) 15/8
(3) ओ दूधवाली ग्वालनिया (सीधा रास्ता 1947) 23/8
(4) ए मोहब्बत उनसे मिलने ( बाजार 1949) 29/8
(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950) 3/9
(6) एक दिन लाहौर की ठंडी (सगाई 1951) 10/9
साइकल संगीत की प्रस्तावना हो गई थी, परिचय भी हो गया था। बस थोड़ा तवा भाजी में उलझ गए। गाने के साथ खाना भी तो जरूरी है! काम चलाऊ पेट भर गया है, अब फिर से अपनी औकात पर आ जाते हैं! तवा भाजी के ढाबे को कुछ दिनों के लिए पीछे छोड़कर वापस लौटते हैं। संगीत पर आ जाते हैं, साइकल के साथ।
गान काज कीन्हें बिनु, मोहि कहाँ विश्राम!
कुछ दिनों के लिए भूल जाते हैं ख़ावन के नज़ारे। और अब देखते हैं सावन के नज़ारे...!
हिंदी फिल्म संगीत में सबसे पहले कौन से गाने में साइकल दिखाई दी थी? बड़ा मुश्किल सवाल है! तीस के दशक की फिल्मों में साइकिल अक्सर दिखाई दे जाती हैं। लेकिन कोई साइकिल गीत भी है क्या? होंगे तो जरूर। पर हमारी निगाह से अभी तक बचे हुए हैं। तीस के दशक की पिक्चरों को ढूंढना, देखना और फिर उसमें से साइकल खोजना! हे भगवान, बड़ा मुश्किल काम है ये तो! पर करेंगे धीरे-धीरे!
अभी तक कुल 105 साइकिल गीतों को खोजा है। मतलब कम से कम तीन साल का एक और प्रोजेक्ट! अभी तक की हमारी रिसर्च के अनुसार, संभवतः पहला साइकिल गीत ये ही है: सावन के नज़ारे हैं। फिल्म : खजांची (1941)।
गाना: सावन के नज़ारे हैं। फिल्म : खजांची (1941)।गायक: गुलाम हैदर। गायिका: शमशाद बेगम। गीतकार: वली साहब। संगीतकार: गुलाम हैदर। पर्दे पर हैं: रमोला, एसडी नारंग और अन्य कलाकार।
इस गाने को अच्छे से पढ़ लें, समझ लें और फिर देख भी लें: इस लिंक से।
सावन के नज़ारे हैं
आ हा आ हा
सावन के नज़ारे हैं
आ हा आ हा ।
कलियों की आँखों में
लाला ला ला ला
मस्ताना इशारे हैं
कलियों की आँखों में
मस्ताना इशारे हैं ।
जोबन है फिज़ाओं में
जोबन है फिज़ाओं में
खो जाए गले मिलकर
मधु मूरत घटाओं में
खो जाए गले मिलकर
मधु मूरत घटाओं में ।
उस देश चले सजनी
उस देश चले सजनी
फूलों के यौवन पर
लाला ला ला ला
फूलों के यौवन पर
भौरे न मरे सजनी
फूलों के यौवन पर
भौरे न मरे सजनी ।
उस देश में क्या जाना
उस देश में क्या जाना
प्यार के रंग हो झूठे
प्यार के रंग हो झूठे
जो गीत हो बेगाना
प्यार के रंग हो झूठे
जो गीत हो बेगाना ।
तुम प्रीत को क्या जानो
तुम प्रीत को क्या जानो
आग से मत खेलो
लाला ला ला ला
आग से मत खेलो
ए हुस्न के दीवानों ल
आग से मत खेलो
ए हुस्न के दीवानों।
इस गाने में रमोला देवी, एस डी नारंग और सहेलियों/दोस्तों को सावन के मौसम की पृष्ठभूमि में, प्रकृति के सुंदर सानिध्य में साइकिल चलाते हुए दिखाया गया है। शायद मदन पुरी माउथ ऑर्गन बजा रहे हैं साइकिल पर! गाने के बोल सावन के मौसम की खूबसूरती और युवा प्रेम को बहुत अच्छे से दर्शाते हैं।
ढीली-ढाली पेंट-शर्ट पहने लड़कों का झुंड एक दिशा से साइकिल पर गाता हुआ जा रहा है और साड़ियां पहनी, दो चोटीयां लगाई लड़कियों का झुंड दूसरी दिशा से साइकिल पर गाता हुआ आ रहा है। सभी गा रहे हैं: सावन के नज़ारे हैं...!
इधर लड़कियाँ दिलकश अदाओं की मलिका रमोला के नेतृत्व में गा रही हैं: कलियों की आँखों में
मस्ताना इशारे हैं। उधर लड़के गा रहे हैं: जोबन है फिजाओं में! आदरणीय पूर्वज 'छोरे' भी छिछोरे ही होते थे!
अब लड़कियां साइकिल की घंटी के मधुर संगीत में गाती हैं: उस देश चले सजनी फूलों के यौवन पर भौरे न मरे सजनी । छोरियां नहीं मिल रही हैं तो सीटी बजाते हुए, खट्टे अंगूर याद करते हुए छोरे गा रहे हैं: उस देश में क्या जाना प्यार के रंग हो झूठे। कुछ नहीं बदला, आज भी छोरे ऐसे ही हैं! रोते ही रहते हैं, हलकट!
अंत में लड़कियां गाती हैं: आग से मत खेलो
ए हुस्न के दीवानों। लेकिन हुस्न के दीवाने लड़कों की टोली आग से खेल जाती है! सरासर, दिन दहाड़े!
सुनसान सड़क पर आश्चर्यजनक रुप से सभी साइकिलें एक दूसरे से टकरा जाती हैं! साइकिलें एक दूसरे के ऊपर और हीरो हीरोइन भी। हीरो हीरोइन में प्रेम की तत्काल बुकिंग हो जाती है! बाकी तो आप को ही देखकर समझना है! आगे हम क्या बताएं, उमर निकल गई!
फिल्म इसी गाने से शुरू होती है। आप चाहें तो खजांची (1941) के पहले पांच मिनिट के सीन को देख लें। जब तक अच्छा लगे, देख लेना! मजा आएगा!
सच में दाद तो देनी ही होगी इस गीत के बोलों, संगीत और फिल्मांकन की। आज से 84 साल पहले अपने जमाने की बेड़ियां तोड़कर बाहर आया था। आप पैसे खर्च करके किसी म्यूजियम में जाएं ना जाएं पर ऐसे गाने मुफ्त में जरूर देख लिया करें।
यह गाना हिंदी फिल्मी संगीत के इतिहास में एक बड़ा वाला मील का पत्थर है। इस गाने की कई विशेषताएं हैं:
🚴संभवतः पहला साइकिल गीत।
🚴 पहला गीत जिसमें सीटी का प्रयोग हुआ।
🚴 पहला गीत जो आउटडोर में लड़के और लड़कियों के ग्रुप पर फिल्माया गया हो।
🚴 पहला गीत जिसमें हीरो-हीरोइन ऐसे टकराते हों।
🚴 पहला गीत शमशाद बेगम की आवाज़ में।
🚴 संगीतकार गुलाम हैदर ने इसी फिल्म से शास्त्रीय और गजल गीतों के शुरुआती दौर के बाद फिल्म के गानों में लोक संगीत का पहली बार प्रयोग किया।
हमारे पास इस गाने का एक दूसरा तवा भी है। ये एक वर्शन रिकॉर्ड है। बहुत पुराना है और थोड़ा रेयर भी। इस वर्शन को गाया है बिमलाकुमारी और कुमार ने। कोई हमें 20000 रुपए देकर भी इसे खरीदना चाहेगा तो एक ही जवाब होगा: "भग यहां से...!" अब इस रिकॉर्ड को देख लीजिए।
(सावन के नज़ारे हैं। बिमलाकुमारी और कुमार।)
ये जो रिकॉर्ड है वो बहुत अधिक घिसा हुआ और थोड़ा सा क्रैक भी है। पता नहीं किसके समान! क्योंकि ये गीत यू ट्यूब पर उपलब्ध नहीं है तो आपको हमारी घिसी पिटी रिकॉर्डिंग से ही काम चलाना पड़ेगा। सुनना जरूरी नहीं है, बताना जरूरी था।
फिल्म संगीत में तीस के दशक से ही ऐसे 'वर्शन सॉन्ग्स' शुरू हो गए थे। Version Songs (या "Alternate Versions") वे गाने होते हैं जो:
1. एक ही धुन पर आधारित होते हैं,या
2. उन्हें अलग सिंगर्स, अलग मूड्स, या अलग लिरिक्स ट्रीटमेंट के साथ रिकॉर्ड किया जाता था।
3. और कई बार फिल्म के अलग-अलग सिचुएशन्स में इस्तेमाल होते थे।
इन बिमलाकुमारी का असली नाम खुर्शीद था। तब इस नाम के बहुत सारे कलाकार थे। इसलिए इन्होंने अपना नाम रख दिया: बिमलाकुमारी। इनके द्वारा अभिनीत और गाए दो गानों का संक्षित विवरण और लिंक नीचे दिया है। अब इनके गावन के नज़ारे भी देख लीजिए
गीत:आओ मिल जुल के (बागबान)(1938)। गायक: सितारा देवी, बिमला कुमारी। गीतकार: पता नहीं कौन। संगीतकार: मुश्ताक हुसैन। (इनके सहायक संगीतकार: नौशाद!)
गीत: मत बोलो बहार की बतियाँ । फिल्म: प्रेम नगर ( 1940)। गायिका और अभिनेत्री: बिमला कुमारी। गीतकार: डी एन मधोक। संगीतकार: नौशाद।
आपको कनफ़्यूज़न या भ्रम न हो इसलिए बताते चलते हैं कि सन 1949 में एक और बिमलाकुमारी उभर कर आईं। भ्रम से बचने के लिए इन्हें नाम दे देते हैं: बिमला कुमारी (लाल दुपट्टा)। इनपर ही प्रसिद्ध गाना 'हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का' फिल्माया गया था। और लोग उन्हें लाल दुपट्टा गर्ल के नाम से पहचानने लग गए। उन पर फिल्माए गए दो बेहतरीन गानों का संक्षिप्त विवरण नीचे दिया है।
हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का। फिल्म : बरसात ( 1949)। अभिनेत्री : बिमला कुमारी। गायिका : लता मंगेशकर। गीतकार: रमेश शास्त्री। संगीतकार: शंकर जयकिशन।
धीरे से आजा रे अँखियन में। फिल्म: अलबेला (1951)।अभिनेत्री : बिमला कुमारी। गायिका : लता मंगेशकर।गीतकार: राजेंद्र कृष्ण। संगीतकार: सी रामचंद्र।
अब थोड़ी सी अपनी बात भी कह लें!?
"सावन के नज़ारे" गीत बचपन से सुन रखा था रेडियो पर सत्तर के दशक में। फिर भी अधिकतर लोगों के लिए अस्सी के दशक में भी ये गाना लगभग अनसुना ही था।
सन 1982 में जब इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर (SGSITS, Indore) में आए ही थे, हम सात आठ बैच मेट्स मैगी (अजय गुप्ता) के रविन्द्र नगर वाले घर में अंताक्षरी खेल रहे थे। हमारी टीम को 'स' से गाना था। हमने गा दिया ये गाना: "सावन के नज़ारे हैं..."
सामने वाली टीम के मित्र गिरीश ठकार ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। बड़े आत्मविश्वास और आधिकारिक स्वर में कह दिया: "ऐसा कोई गाना ही नहीं है।" उनकी टीम के लोग भी आक्रामक हो गए, कहने लगे: "ऐसा कोई गाना होत्ता ही नहीं है!"
हमने अकेले मोर्चा संभाला क्योंकि हमारी टीम के लोग ढीले पड़ गए थे। जल्दी ही अंताक्षरी का खेल युद्ध में बदल गया। फिर उन्होंने एक तरफा जीत का जश्न शुरू कर दिया: "हम जीत गए, हम जीत गए, हम जीत गए!"
सही होते हुए भी, हमारी टीम ने हार मंजूर कर ली! लेकिन जश्न तो मनाना ही था। हम लोग भी जश्न में डूब गए और खूब नाचे: "हम हार गए, हम हार गए, हम हार गए!" इस हार के जश्न के मामले में हम लोग एक तरफा जीते!
सन 1987 जब हम नागपुर में थे, एक दिन SGSITS के प्रोफेसर गिरीश ठकार का इंदौर से फोन आया और वो बोला: "गंज बेटे तू सही था! 'सावन के नज़ारे' गाना सच में है! आज दूरदर्शन पर चित्राहार में दिखाया!" ऐसा बोलकर फोन पटक दिया!
उसकी किस्मत बहुत अच्छी थी कि वो डेढ़ हड्डी का उस दिन मेरे सामने नहीं था! पटक-पटक कर कुटाई करता। सावन के नहीं रावण के नज़ारे दिखा देता! फिर वो महीने भर गाता रहता: "घावन के नज़ारे हैं...! अहा उहु अहा!"
पंकज खन्ना
9424810575
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