(6) एक दिन लाहौर की ठंडी सड़क पर!🎶🚲💃



पंकज खन्ना
9424810575

               
साइकिल संगीत की अगली/पिछली ब्लॉग पोस्ट्स: 
(1) साइकल संगीत-परिचय (3/6/2025)
(2) सावन के नज़ारे हैं। (खजांची 1941) 15/8
(3) ओ दूधवाली ग्वालनिया (सीधा रास्ता 1947) 23/8
(5) मेरे घुंघर वाले बाल ( परदेस 1950) 3/9





गानाएक दिन लाहौर की ठण्डी सड़क पर । फिल्म: सगाई (1951)। गायिका: शमशाद बेगम। गायक: रफ़ी और चितलकर। गीतकार: राजेंद्र कृष्ण। संगीतकार: सी रामचंद्र। पर्दे पर: याकूब, गोप, रेहाना और साथी। 

बात विभाजन से पूर्व  के अखंड भारत के लाहौर की किसी काल्पनिक ठंडी सड़क की है। मतलब भूत काल की बात है। वर्तमान में बहुत लफड़े हैं, बाउजी। भविष्य तो अंधकार में है ही! अतीत में झांकना सबसे सस्ता, सुरक्षित और मजेदार काम है! आओ मिलकर फिर यही करते हैं:)

तो आज के गाने के पहले दृश्य में याकूब और गोप की कॉमिक एंट्री 'टैंडम साइकिल' पर दिखाई गई है, जिससे माहौल हल्का-फुल्का और हंसी-ठिठोली से भर जाता है। इस मजेदार हास्य गीत को स्टेज पर एक दृश्य में प्रस्तुत किया गया है। 

याकूब और गोप, जो उस जमाने के जबरदस्त कॉमेडियन थे, एक खड़ी Tendom Cycle पर बैठे-बैठे, खाली-पीली बोम मार रहे हैं। बोले तो, खाली-पीली पैडल मार रहे हैं! हिंदी फिल्मों में पहली बार Tendom Cycle शायद इसी गाने में दिखाई दी है।

दोनों बड़े गर्व से गा-गा कर बता रहे हैं कि कैसे वो  लाहौर की 'ठंडी सड़क' पर लड़कियां छेड़ने गए और उन पर  कैसे जूतों की बरसात हो गई! आप खुद ही पढ़ लीजिए, देख लीजिए और सुन लीजिए इनके कारनामे! 

(आज के मजनू तो इतने ईमानदार होते नहीं हैं। इतना पिट के आएंगे कि ठीक से बैठ भी नहीं पाएंगे, खून के घूंट पिएंगे, फिर भी मोहल्ले में आकर इतरा के बोलेंगे: हमने तो लैला के साथ काफी पी!) 

इधर ये स्वयं की पिटाई का बखान कर रहे हैं और पीछे से रेहाना के नेतृत्व में लड़कियों की टीम भी नाचते, गाते आ जाती है। और वो भी इनकी धुलाई/धुनाई/सुताई/पिटाई का मजे ले लेकर वर्णन करती हैं। 


अब इस गाने के बोल अच्छे से पढ़ लीजिए।

एक दिन लाहौर की ठण्डी सड़क पर शाम को जा रहे थे साइकल पर हम ज़रूरी काम को
अजी सामने से आ रही थीं बुलबुलों की टोलियाँ
रोक कर साइकल लगे हम सुनने मीठी बोलियाँ।

ओ तेरी बिगड़ गई बनते-बनते बात
हुई वो जूतों की बरसात तबीयत साफ़ हो गयी साफ़
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़
बिगड़ गई बनते-बनते बात हुई वो जूतों की बरसात
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़।

चले थे करने कारोबार सड़क पर कर बैठे क्यों प्यार।
हो गया पल भर में ये हाल के उड़ गये सर के सारे बाल
के उड़ गये सर के सारे बाल तबीयत साफ़ हो गयी साफ़
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़
बिगड़ गई बनते-बनते बात हुई वो जूतों की बरसात
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़।

मिला ये उलफ़त का ईनाम मिला ये उलफ़त का ईनाम
हो गये घर-घर में बदनाम हो गये घर-घर में बदनाम
गये थे बन के ये गुलफ़ाम वापिस आये घुटना थाम
ये वापिस आये घुटना थाम तबीयत साफ़ हो गयी साफ़
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़
बिगड़ गई बनते-बनते बात हुई वो जूतों की बरसात
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़।

कहूँ मैं एक पते की बात कहूँ मैं एक पते की बात
ये ज़ालिम दिल है बड़ा बदज़ात 
ये ज़ालिम दिल है बड़ा बदज़ात
इसी दिल की थी करतूत
इसी ने पड़वाये हैं जूत इसी ने पड़वाये हैं जूत
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़ तबीयत साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़ हो गयी साफ़
बिगड़ गई बनते-बनते बात हुई वो जूतों की बरसात
तबीयत साफ़ हो गयी साफ़।


रेहाना और उनकी टीम ने याकूब और गोप के कुछ ऐसे मजे लिए हैं इस गीत में, हंसते और नाचते हुए:

'मिला ये उलफ़त का ईनाम हो गये घर-घर में बदनाम।
गये थे बन के ये गुलफ़ाम वापिस आये घुटना थाम।'

(आपको ये सोच के अच्छा लग रहा होगा कि आपसे पहले भी और लोग लैलाओं से पिट चुके हैं! हैं ना बड़े भिया!?)

रेहाना, गोप और याकूब की बेहतरीन  तिकड़ी ने इस फिल्म के साथ कुछ और फिल्मों को भी खूब सफल और लोकप्रिय बनाया था, अलग-अलग जोड़ियों और तिकड़ियों में।

गोप और याकूब को उस ज़माने में हिंदी सिनेमा का “Laurel and Hardy” कहा जाता था। ये भारतीय फिल्मों की पहली सफल कॉमिक जोड़ी थी जिसने पतंगा (1949), बेकसूर (1950) और सगाई (1951) जैसी फिल्मों में खूब धमाल मचाया। उनकी टाइमिंग, मासूमियत और मज़ेदार बॉडी लैंग्वेज दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान बिखेर देती थी और वो बड़े हीरो-हीरोइन के बीच भी अपनी अलग पहचान बना लेते थे। लगे हाथ गोप और याकूब पर एक छोटा वीडियो देख डालिए, मज़ा आएगा।

गोप और रेहाना पर फिल्म सगाई में ही ये एक खूबसूरत गीत भी फिल्माया गया है: डैडी जी ओ डैडी जी। फिल्म सगाई के सभी गाने देखने के लिए इधर क्लिक करें  या उधर क्लिक करें!

इन तीनों कलाकारों के बारे में थोड़ा और जान लेते हैं।

रेहाना: रेहाना के  गीतों में नृत्य, फैशन और भाव-भंगिमा तीनों का अनूठा संगम दिखता है। उस दौर की "डांसिंग क्वीन" और Post-Partition वाली बड़ी हीरोइन रेहाना के नृत्य के बारे में हम पहले भी रेल संगीत में निम्नलिखित ब्लॉग पोस्ट्स में चर्चा कर चुके हैं: 

ब्लॉग पोस्ट नंबर (13) गाना:  जवानी की रेल चली जाए रे। फिल्म: शहनाई (1947)। जवानी के ढलने और रेल के चलने की सुंदर तुलना!  

ब्लॉग पोस्ट नंबर (16) हेलो हेलो जेंटलमैन । फिल्म: एक्ट्रेस(1948)। रेहाना और सखियों द्वारा हीरो की  रैगिंग/खिंचाई!

ब्लॉग पोस्ट नंबर (22) धक धक करती चली जीवन की रेल रे। फिल्म: दिलरुबा (1950)। रेहाना, याकूब और नाटक मंडली की ट्रेन के डिब्बे में सुंदर रिहर्सल। 

अगर आपने पहले ये तीनों लेख नहीं पढ़े हैं तो अब पढ़ लें। सभी कोर्स में हैं! और अनिवार्य भी!!

रेहाना पर फिल्माए गए बहुत सारे गानों की छोटी-छोटी लेकिन नयनाभिराम झलकियां देखने के लिए यहां क्लिक करें।

गोप: गोप अपनी गोल-मटोल शक्ल और बच्चों जैसी भोली एक्टिंग की वजह से हर फिल्म में दर्शकों का दिल जीत लेते थे। गोप के बारे में बात करें तो  पतंगा (1949) का गाना 'मेरे पिया गए रंगून' याद आ ही जाता है। गोप के बारे में और जानने के लिए ये शॉर्ट वीडियो देख सकते हैं। और अगर हमारे समान फुरसती हैं तो उनके बारे में और अधिक जानने के लिए ये वीडियो भी  देख लें। वैसे अगर आप यहां तक पहुंच ही चुके हैं तो आप भी फुरसती ही हैं! जिंदगी में  फुरसत हो तो फुरसत में ही जिंदगी है।

याकूब: याकूब ने साइलेंट मूवीज के समय से ही काम शुरू कर दिया था। वह अपनी हास्य भूमिकाओं और हास्य खलनायक के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने 100 से अधिक फिल्मों में काम किया था। कुछ का जिक्र रेहाना और गोप के साथ ऊपर हो ही चुका है।

याकूब के प्रशंसकों ने उनके बारे में काफी जानकारी भरे वीडियो बनाए हैं। आप जरूर देखिए: याकूब के बारे में एक शॉर्ट वीडियो। और एक  दूसरा वीडियो भी।

याकूब के लिए फिल्म के क्रेडिट में ऐसा लिखा पाया गया है: …and your favourite Yakub! बाद में इसी प्रकार से  फिल्मों के क्रेडिट में प्राण के लिए लिखा जाता  था:  ....and Pran! लेकिन शुरुआत याकूब से ही हुई थी।

वो एक अच्छे गायक भी थे। उनके द्वारा गाई  इस प्रसिद्ध पैरोडी को जरूर  सुनें : इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा।* ( इस लोक गीत के बारे में अतिरिक्त जानकारी ब्लॉग के नीचे दी  है।)*

ये पैरोडी फिल्म फिल्म आबरू (1943) की है जिसमें सितारा देवी हीरोइन हैं। संगीतकार हैं पंडित गोविंदराम।

इस गीत में  याकूब  दुपट्टा ओड़कर, मटक-मटक कर, हाथ/पैर/आंखें घुमा-घुमा कर, शास्त्रीय संगीत की धुन पर हौले-हौले नाच रहे हैं। और हीरोइन सितारा देवी पश्चिमी लिबास में उनके पास बैठकर धूम्रपान कर रही हैं, धुआं याकूब के मुंह पर मार रही हैं। गाने के अंत में सितारा देवी रिकॉर्ड चेंजर पर कोई अंग्रेज़ी धुन लगा देती हैं। वो दोनों और बाकी देशी परिधान धारी  साजिंदे भी इस लोक गीत की देशी धुन छोड़कर अंग्रेजी धुन पर थिरकने लगते हैं, गया दादरा तेल लेने!

सितारा देवी , याकूब और अन्य साजिंदों की बात तो छोड़ ही दो, वो लोग अंग्रेजों के जमाने के थे। उन लोगों पर अंग्रेजों का बहुत ताज़ा-ताज़ा प्रभाव था। हम भारतीय लोगों का 75 साल बाद भी यही हाल है! 

कितनी भी भारतीयता की बात कर लें, आखरी में अंग्रेजी आ ही जाती है। वैवाहिक या अन्य किसी भी मांगलिक कार्य के वैदिक/हवन विधियों  द्वारा संपन्न होते ही दूसरे टाइप के अंग्रेजी हवन शुरू हो जाते हैं!

किसी को कोई समस्या नहीं है ऐसे अंग्रेज़ी हवन-भजन से! हम सभी मैकाले की शिक्षा पद्धति की  संताने हैं। देश की लाखों होनहार संतानें लगी हुई हैं WhatsApp में ऐसी चर्चा करने के लिए। हम निश्चिंत हैं वहां चर्चा चल्लई है। चलती रहेगी!

हमारी भी 'भूत की सवारी' और साइकिल चलती जा रही है, ईश कृपा से🙏। चाहते हैं आपको सभी सौ से अधिक साइकिल गीत सुना दें, जल्दी से! बस भाषा और संगीत के माध्यम से खुशियां बांटने की इच्छा भर है।🙏🙏

अगले पोस्ट में आपको दिखाएंगे साइकिल वाले बाबू की लैलागिरी! तैयार रहिएगा!



पंकज खन्ना
9424810575

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हिन्दी में:

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CAT-a-LOG: CAT-IIM कोचिंग।छात्र और पालक सभी पढ़ें।
Corruption in Oil Companies: HPCL के बारे में जहां 1984 से 2007 तक काम किया।

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* इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा! ये एक पारंपरिक लोक गीत संरचना है जो दशकों से देश में गाई जाती रही है। सच तो ये है कि इसका इतिहास गानों की रिकॉर्डिंग शुरू होने से भी बहुत दशकों पहले का है। किसने इसे  लिखा और किसने  सबसे पहले गाया, अभी तक तो नहीं मालूम है। अभी तक की जानकारी के अनुसार इस गीत के चार संस्करण इस प्रकार से हैं:

(1)  'इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मोरा' सन 1918 में रिकॉर्ड किया गया था। संभवतः पहली बार। तब इसे गाया था अख्तरी जान ने। इस रिकॉर्ड को सुनने के लिए यहां क्लिक करें। बताते चलें कि ये अख्तरी जान लखनऊ वाली हैं। अख्तरी बाई (बेगम अख्तर) अलग कलाकार हैं और कहीं अधिक प्रसिद्ध हैं।

इस बात की भी अच्छी खासी संभावना है कि अख्तरी जान के पहले या बाद में भी कुछ महिला या पुरुष गवैय्यों ने  इस गाया और रिकॉर्ड भी कराया हो। 

(2) इस गीत के पहले फिल्मी संस्करण की बात की जाए तो शायद पहली बार फिल्म हिम्मत (1941) में  इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा  को रिकॉर्ड किया गया था। और इसे  शमशाद बेगम ने संगीतकार पंडित गोविंदराम के संगीत में गाया था। वैसे तो ये एक  प्राचीन पारंपरिक गीत है लेकिन फिल्म में और रिकॉर्ड में अज़ीज़ कश्मीरी को इसका गीतकार बताया गया है!

(3)  दूसरी बार फिल्मों में याकूब ने  इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा की पैरोडी फिल्म आबरू (1943) में गाई जिसका विवरण ऊपर दिया गया है। इस पैरोडी के संगीतकार भी  पंडित गोविंदराम ही हैं। फिल्म के क्रेडिट के अनुसार पैरोडी के गीतकार इनमें से कोई एक हैं : तनवीर नकवी, रज्जन, हसरत लखनवी, स्वामी रामानंद सरस्वती।

(4) बाद में फिल्मों में तीसरी बार  इसी गीत ( इन्हीं लोगों ने...) को पाकीज़ा(1972) फिल्म में लता ने गुलाम मोहम्मद के संगीत में गाया। पर्दे पर थीं मीना कुमारी। इस बार गीत लिखने का श्रेय मजरूह सुल्तानपुरी को दिया गया है!

मजे के बात ये है कि इस पारंपरिक गीत को फिल्मों में अलग-अलग समय पर अलग-अलग गीतकारों ने 'लिखा' है और क्रेडिट भी लिया है! 

असली कलाकार इन फिल्म वालों की  क्रेडिट लेने की  कुप्रथा को देखकर ऊपर से गा रहे होंगे:  इनी लोगन ने ले लीना दुपट्टा मोरा !!!

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