(27) जब दिन हसीन, दिल हो जवान क्यों ना मनाएं पिकनिक!

आज का गाना: (22) जब दिन हसीन, दिल हो जवान तो क्यों न मनाएं पिकनिक।
     
गीत: जब दिन हसीन दिल हो जवां। फिल्म: अदालत(1958)। गायक: रफी, गायिका: आशा भोंसले। गीतकार: राजिंदर कृष्ण।  संगीतकार: मदन मोहन। पर्दे पर: नर्गिस, प्रदीपकुमार और साथी। गाने के बोल। फिल्म के गाने। 

इस गीत में फिल्म इंडस्ट्री की 'मदर इंडिया' यानी नर्गिस 'गॉगल वाला चश्मा' पहनकर और उनकी साइकिल के हैंडल पर फैशनेबल बैग टांग  कर हीरो प्रदीप कुमार और अन्य साथीयों के साथ साइकिल पर पिकनिक पर जाते हुए ये गीत गा रही हैं: जब दिन हसीं, दिल हो जवाँ क्योँ ना मनाएं पिकनिक। सीने में आग होंठों पे राग
मिलजुल के गाएं पिकनिक। साईकल सवार, बाँधे कतार, लो हम चले
जंगल के पार, हिरनों की डार जैसे चले।...

(इसके पहले हम नर्गिस पर फिल्माया गया साइकिल  गीत दुनिया हमारे प्यार की यूं ही जवाँ रहे सुन चुके हैं।)

पचास के दशक के अन्य साइकिल गीतों के समान इस गाने में भी वाहन रहित प्राकृतिक हरियाली वाले रस्ते दिखाई देते हैं। अब  साइकिल चलाने के लिए ऐसे खुले रास्ते कभी नहीं मिल सकते। सच में पचास और साठ के दशक में साइकिल चलाना कितना मजेदार होता होगा!

सभी दोस्त कभी कतार में कभी झुंड में जंगल के रास्तों से साइकिल चलाते हुए और गाते हुए दिखाए गए हैं। इन  सब ने नौका विहार का भी आनंद लिया। आप देखकर आनंद ले लीजिए।

हम बच्चे भी सत्तर के दशक में साइकिलों पर आटा, दाल , बर्तन व अन्य जरूरी सामान लाद कर पारसी मोहल्ले से आस पास के स्थानों जैसे पिपलिया पाला/पिपलिया हाना/सुख निवास/ डबल चौकी/ राउ/ महू/ पाताल पानी आदि पर सीटी बजाते हुए पिकनिक मनाने जाया करते थे। पिकनिक स्थल पर पहुंचकर दाल, बाटी, सब्जी और चटनी बनाई जाती थी। सच में बहुत याद आती हैं वो पिकनिक! तब हम सब इंसान थे अब सिर्फ उपभोक्ता रह गए हैं। 

साइक्लिंग, पिकनिक और सीटीबाजी का बहुत पुराना संबंध रहा है। अभी तक सीटीबाजी और साइक्लिंग पर ये ब्लॉग पोस्ट लिखी गई हैं:


अब जमाना 'अच्छे' के लिए बदल चुका है।  साइक्लिंग वाली  पिकनिक  सिर्फ इतिहास की बात हो गई हैं। अब जवान लोग फिल्मी हस्तियों से प्रभावित हो कर पब, क्लब, फार्म हाउस या रिसॉर्ट आदि में  पार्टियां करते हैं, नाचते गाते हैं और उड़ते भी हैं! उनकी जिंदगी, उनकी इच्छा!!

आज भी दिन हसीं होते हैं, दिल जवान होते हैं।  सीने में आग और होठों  पे राग आज भी है। लेकिन जमाने के साथ चलने वाले ये आधुनिक लोग दिन में पिकनिक नहीं रात में पार्टी करते हैं। 

हमारी इच्छा तो साइकिल चलाते-चलाते सीटी बजाने की हो रही है। दोस्तों, Event Managers को परे हटाकर फिर चलें साइकिल पर सामान लेकर पिकनिक मनाने, कहीं आसपास!? फिर से इंसान बनें एक दिन के लिए, उपभोक्ता की मानसिकता को छोड़कर?


सीटी बजाएंगे और यही गीत गाएंगे: जब दिन हसीन दिल हो जवां! क्यों न मनाएं पिकनिक!?

और भिया आप खूब सारी रीलें भी बना सकते हैं! कम्मो दद्दी खुस हो जाएगी!!


पंकज खन्ना 

9424810575



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