ज़रा अपनी आँखें बंद कीजिए और 50-60 के दशक वाले उस सुनहरे दौर में आज फिर लौट आइए हमारे साथ। एक बेहद सुहाना हरियाली से सजा हुआ जंगली या ग्रामीण रास्ता है। रास्ते के बीच में एक पुरानी यादों वाला खूबसूरत विंटेज पुल भी नज़र आता है।
और इसी दिलकश नज़ारे के बीच इस पुल के ऊपर से ही अपनी-अपनी साइकिलों पर एंट्री लेते हैं हमारे आज के हीरो बस कंडक्टर प्रेमनाथ और मनमोहक अदाओं वाली हीरोइन श्यामा। चेहरे पर वो मासूम सी शरारत, और आँखों ही आँखों में होता हुआ इज़हार-ए-इश्क़।
साइकिल की घंटी की 'टीरिन टीरिन' के साथ दोनों एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराते हैं और फिज़ाओं में मिसरी घोलते हुए गुनगुना उठते हैं: ज़िंदगी में रंग भरा है प्यार का...।
और फिर साइकिल से उतरकर भी बगीचे में नाच, गाना और रोमांस शुरू कर देते हैं।
बस, इस रेट्रो रोमांस के नज़ारे को देखकर ऐसा लगता है, बस कंडक्टर ही बन जाते यार! साइकिल संगीत छोड़कर 'बस संगीत' ही शुरू कर देते! (वैसे तवा संगीत, रेल संगीत और साइकिल संगीत, बस संगीत के ही प्रकार हैं!)
फिल्मी कहानी कुछ यूं है कि मुख्य किरदार बस कंडक्टर (प्रेमनाथ) एक बेहद ईमानदार और मेहनती इंसान हैं, जो अपनी सादगी भरी जिंदगी जी रहे हैं। उसकी इस साधारण सी जिंदगी में रंग तब भरते हैं, जब उसकी मुलाकात एक खूबसूरत लड़की (श्यामा) से होती है और दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है।
लेकिन, 1950 के दशक की क्लासिक फिल्मों की तरह, इस प्रेम कहानी में भी कई रुकावटें आती हैं। अमीरी-गरीबी का सामाजिक फासला और कुछ खलनायकों की साजिशें उनके प्यार का कड़ा इम्तिहान लेती हैं।
इम्तिहान छोड़ो, कहानी छोड़ो, फिल्म में खूब सारे गाने-गूने भरे हुए हैं। आप तो बस गाने देखो गाने!
और आज का ये गाना एक बेहद खूबसूरत और रूमानी साइकिल गीत है। इस गाने में प्यार को जीवन में उमंग और रंग भरने वाले एक जादुई अहसास के रूप में पेश किया गया है। गीत के बोलों में प्रेम की गहराई और जीवन की सुंदरता को बड़ी ही शालीनता से दर्शाया गया है, साइकिल के साथ।
इस गाने में और फिल्म में प्रेमनाथ और श्यामा की शानदार गणितीय नजदीकियों को दर्शकों द्वारा काफी पसंद किया गया था।
रफी और आशा भोसले ने इसे अपनी चिरपरिचित मधुर आवाज़ में गाया है। इसके संगीतकार और गीतकारों के बारे में हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं।
प्रेमनाथ ने करियर की शुरुआत एक रोमांटिक हीरो के रूप में की थी। हालांकि, अपने दमदार व्यक्तित्व और शानदार आवाज़ के कारण वे बाद के दशकों में खलनायक और चरित्र अभिनेता के रूप में भी बेहद मशहूर हुए। 'जॉनी मेरा नाम' और 'बॉबी' जैसी फिल्में इसका बेहतरीन उदाहरण हैं।
श्यामा 1950 और 60 के दशक की एक बेहद लोकप्रिय और प्रतिभाशाली अदाकारा थीं। वे अपनी खूबसूरत मुस्कान, चुलबुले अंदाज़ और स्वाभाविक अभिनय के लिए जानी जाती थीं। 'आर-पार' और 'बरसात की रात' जैसी फिल्मों से उन्होंने सिनेमा जगत में अपना एक बड़ा मुकाम बनाया था।
उनके प्रशंसक तो उस जमाने में शायद यही गाते रहते होंगे: श्यामा श्यामा बोल! श्यामा श्यामा बोल!! या फिर श्यामा आन बसो वृंदावन में।
भिया आपसे तो सिर्फ इतना ही कहना है उनका: बाबूजी धीरे चलना!
पंकज खन्ना
9424810575
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हिन्दी में:
तवा संगीत : ग्रामोफोन का संगीत और कुछ किस्सागोई।
रेल संगीत: रेल और रेल पर बने हिंदी गानों के बारे में।
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तवा भाजी: वन्य भाजियों को बनाने की विधियां!
अंग्रेजी में:
Epeolatry: अंग्रेजी भाषा में रुचि रखने वालों के लिए।
CAT-a-LOG: CAT-IIM कोचिंग।छात्र और पालक सभी पढ़ें।
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