(37) ज़रा बचके चलना, ज़रा हट के चलना, कि शाही खटारा चला आ रहा है।


आज का गीत: (37) ज़रा बच के चलना, ज़रा हट के चलना कि शाही खटारा चला आ रहा है। लगी है भूख हमको, बजे हैं पौने बारा। ये आलू बुखारा लो अब आ रहा है!

                (निशि कोहली।)



गाना
ज़रा बच के चलना, ज़रा हट के चलना कि शाही खटारा चला आ रहा है। फिल्म: क्या ये बॉम्बे है (1959)। गायक: मोहम्मद रफ़ी। गायिका: आशा भोंसले। गीतकार: नूर देवासी। संगीतकार: बिपिन दत्ता।  परदे पर: मारुती परब, निशि कोहली, सखियाँ और एक शाही खटारा साइकिल रिक्शा। गाने के बोलफिल्म के सभी गाने

गाने की शुरुआत में फिल्म के हीरो मारुति एक टूटी फूटी मालवाहक साइकिल रिक्शा को हांक कर चलाते हुए दिखाई देते हैं। रिक्शे के हैंडल पर एक भोंपू लगा हुआ है जिसे वो बजा रहे हैं। बस थोड़ी सी प्रॉब्लम है साइकिल रिक्शा में: इसका अगला पहिया गायब है।


हीरो मारुति को कुछ खाने का सामान हीरोइन निशि कोहली और उनकी सखियों को डिलीवर करना था। जाहिर है वो लेट हो गए थे, इस ज़ालिम खटारा के कारण।

निशि को सामने पाकर वो गाने लगते हैं: ज़रा बच के चलना, ज़रा हट के चलना कि शाही खटारा चला आ रहा है

और निशि कोहली का गाने में जवाब ये होता है: लगी है भूख हमको, बजे हैं पौने बारह। ये आलू बुखारा लो अब आ रहा है।

दोनों तरफ नोंक झोंक होती है। ऐसे ही मजेदार शब्दों का आदान प्रदान होता है।गाने के बोल पढ़कर या गाना सुनकर आप ये सब अच्छे से समझ सकते हैं। थोड़ी देर के बाद मारुति सामान की डिलीवरी कर देते हैं। 

और फिर दोनों बगैर किसी लाग लपेट के और बिना समय बर्बाद किए नाचना, गाना और रोमांस शुरू कर देते हैं।

ऐसा दार्शनिक गीत है ये, भियाओ।
आप और हम जैसे इस्तमरारी/ शाश्वत  छिछोरों को तो ऐसा दर्शन ही समझ आता है और अच्छा लगता है!

हीरो? चेक। संगीतकार? चेक। गीतकार? चेक। गायक? वो भी चेक! पिछले पोस्ट में हमने इसी फिल्म के पहले गाने की पूरी जन्मकुंडली खंगाल ली थी। पर ठहरिए... क्या कुछ छूट रहा है? जी हाँ, वो चेहरा जिसने आज के गाने में जान फूंकी! अब बात होगी फिल्म की दिलकश हीरोइन निशी कोहली के बारे में।

इस गाने से आपको निशी के जलवों का 'ट्रेलर' मिल ही गया होगा! 50-60 के दशक की ये हसीन एक्ट्रेस भले ही टॉप सुपरस्टार न रही हों, पर दर्शकों के दिलों का 'वीआईपी पास' उनके पास भी था। कभी दमदार सपोर्टिंग रोल तो कभी छोटे बजट की 'क्वीन' बनकर उन्होंने अपनी  अदाकारी से सबका दिल जीता। वो बॉलीवुड का ऐसा 'देसी तड़का' थीं, जो फिल्म का स्वाद बड़ा देती थीं!

आज का ये साइकिल रिक्शा गीत कम सुना हुआ जरूर है, पर किसी से कमतर नहीं है। अंत में बस यही सुर छेड़ना चाहूंगा कि ये 'साइकिल रिक्शा' गीत भले ही गलियों, रेडियो या पार्टियों में जमकर ना गूंजा हो, लेकिन इसकी धुन और शब्दों का नशा किसी भी मशहूर तराने से कम नहीं है।


पंकज खन्ना 

9424810575



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