(35) इरीरी राका, आका का बाका, बाका का टाका... दो उस्ताद (1959).
पंकज खन्ना
9424810575
आज का गीत: (35) इरीरी राका, आका का बाका, बाका का टाका।
गाना: इरीरी राका, आका का बाका, बाका का टाका। फिल्म: दो उस्ताद(1959)। गायक: रफ़ी। गीतकार: क़मर जलालाबादी। संगीतकार: ओ पी नैय्यर। पर्दे पर : राज कपूर। गाने के बोल। फिल्म के सभी गाने।
गाने के बारे में एक बात पहले ही साफ कर दी जाए। ये सही मायनों में एक साइकिल गीत नहीं है। लेकिन ब्लॉग सीरीज़ में साइकिल गीत के नियम जो बनाए गए हैं, उनमें ये फिट बैठता है। क्योंकि गाने में थोड़ी देर के लिए राज कपूर एक Tandem Cycle पर सवार होते हैं!
गाना सुनने, समझने और इस ब्लॉग पोस्ट को पढ़ने के बाद शायद आपको भी लगेगा कि अच्छा हुआ इसे साइकिल गीत मान लिया गया है! ये एक अनोखे बोलों वाला, हास्य गीत और रॉक एंड रोल गीत भी है।
इस गीत में कई प्रकार के वाहन विचित्र स्टाइल में दिखाए गए हैं जैसे: बैलगाड़ी, घोड़ा गाड़ी, ठेला, कई लोगों द्वारा ढोई जानेवाली बड़ी सी ट्राली, एंटीक कार, और एक अदद खूबसूरत Tandem साइकिल!
ये गीत केवल सुनने में ही मज़ेदार नहीं है, इसका फिल्मांकन भी उतना ही चंचल और जीवंत है।
इस गीत की सबसे दिलचस्प बात यह है कि "आका का बाका, बाका का टाका" जैसे शब्दों का कोई शाब्दिक अर्थ नहीं है। ये केवल ध्वनि, लय और शरारती माहौल बनाने के लिए गढ़े गए निरर्थक शब्द हैं। उस दौर में ऐसे मुखड़े श्रोताओं का ध्यान तुरंत खींच लेते थे और गीत को यादगार बना देते थे।
आगे गीत में "वर्ली का नाका, दुनिया धमाका, कदम-कदम पे छोड़ो एक पटाखा" जैसी पंक्तियाँ आती हैं, जो मुंबई की चहल-पहल और सड़कछाप मस्ती का परिचय देती हैं।
यह उन गिने-चुने गानों में से एक है जिसमें राज कपूर को मुकेश नहीं बल्कि रफी की आवाज़ दी गई है। इस फ़िल्म का संगीत ओ पी नैय्यर ने दिया था। उनकी धुनों में रफ़ी की मस्ती भरी आवाज़ और ऊर्जा बिल्कुल फिट बैठती है।
गीत में राज कपूर अपने परिचित भोले-भाले लेकिन शरारती अंदाज़ में नज़र आते हैं। वे लगातार उछलते-कूदते, नाचते, इशारे करते और मज़ाकिया हरकतों से माहौल को हल्का-फुल्का बनाए रखते हैं। कैमरा भी उनके साथ चलता हुआ लगता है, जिससे गीत में सुंदर सहजता, थोड़ी सी बेफिक्री और बहुत सारी ऊर्जा आ जाती है।
गाने में मधुबाला तो नहीं हैं लेकिन फिल्म में उनका अभिनय बहुत खूबसूरत है। वे केवल मुस्कुराकर खड़ी रहने वाली नायिका नहीं हैं। उनकी आँखों की शरारत, हल्की-सी झेंप, नकली नाराज़गी और फिर मुस्कान; हर भाव राज कपूर के अभिनय का जवाब देता है। दोनों कलाकार एक-दूसरे की लय पकड़कर अभिनय करते हैं, इसलिए कोई दृश्य बनावटी नहीं लगता।
फिल्म में राज कपूर और मधुबाला के बीच का गणित (सिर्फ केमिस्ट्री नहीं) बहुत सहज है। दोनों एक-दूसरे पर हावी होने की कोशिश नहीं करते। कोई जोड़ नहीं, कोई घटाव नहीं, सब बराबर।
राज कपूर हास्य लेकर आते हैं, तो मधुबाला अपनी मुस्कान और आँखों के भावों से उसे संतुलित कर देती हैं।
दोनों के बीच संवाद और नज़रें ऐसे लगती हैं जैसे दो दोस्त छेड़छाड़ कर रहे हों, न कि केवल हीरो-हीरोइन रोमांस निभा रहे हों।
ओ. पी. नैयर की तेज़ रफ़्तार धुन और मोहम्मद रफ़ी की चुलबुली गायकी ने इस गीत को ऐसा मस्तीभरा बना दिया है कि सुनते ही पैर थिरकने लगते हैं।
अरे कहां चल दिए!? रुको तो सही! थिरकना भी है अभी तो!
सुनो, इतनी बात कर ही ली है इस जोड़ी पर तो चलते चलते इसी फिल्म में इनके ऊपर फिल्माए गए इस कम सुने और बहुत कम समझे गए गाने को देख लें, समझ भी लें:)
पंकज खन्ना
9424810575
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