(34) लहरों में झूल के।
पंकज खन्ना
आज का गीत: लहरों में झूल के, खुशियों में फूल के, देखो जी दीवाने हॉलिडे मनाने चले, लिखना-पढ़ना भूल के।
गीत: लहरों में झूल के । फिल्म : दो गुंडे (1959)। गायक: रफी। गायिका : आशा भोंसले। गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी। संगीतकार: गुलाम मोहम्मद। पर्दे पर: सुबीराज, कुमकुम, अजीत, प्राण और अन्य। गाने के बोल। फिल्म के सभी गाने।
"लहरों में झूल के, खुशियों में फूल के, देखो जी दीवाने हॉलिडे मनाने चले, लिखना-पढ़ना भूल के" एक बड़ा ही चंचल और कम सुना गया लेकिन बेहद दिलकश साइकिल और पिकनिक गीत है।
इस गीत को सुबीराज कक्कड़, कुमकुम, प्राण, अजीत और अन्य साथी कलाकारों पर फिल्माया गया है। गीत में कॉलेज के कई छात्र-छात्राएँ साइकिलों पर पिकनिक के लिए निकलते हैं। अजीत और प्राण ( फिल्म के दो गुंडे) भी अलग से इन युवाओं को देखते हुए नज़र आते हैं। लेकिन वे इस गीत को लिप-सिंक नहीं करते हैं।
('दो गुंडे': अजीत और प्राण, फ़िराक में!)उस समय "हॉलिडे" मनाने की संस्कृति भारत में बहुत सीमित थी, इसलिए यह गीत अपने दौर से थोड़ा आगे का मॉडर्न पिकनिक गीत था।
ये गुलाम मोहम्मद की बाद की फ़िल्मों में से एक है। उनकी धुनों में शास्त्रीयता के साथ मधुरता का अद्भुत मेल मिलता है। इस गाने में आपको सिर्फ मधुरता और मौज मस्ती मिलेगी, भर-भर के।
गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने छुट्टियों और मस्ती के माहौल को बड़े हल्के-फुल्के अंदाज़ में शब्द दिए हैं। अंग्रेजी शब्द हॉलीडे को भी जोरदार तरीके से सजाया है।
रफी के बारे में क्या कहें, वो तो हर दूसरे साइकिल गीत में आपको सुर और ताल में गाते मिल जाएंगे। वो अक्सर अकेले ही गाने की साइकिल खींच ले जाते हैं। लेकिन इस गीत में उनका सुंदर साथ दिया है आशा भोंसले ने। आशा ने इस गाने को एक अलग ही दिलचस्प अंदाज में गाया है। शब्दों में क्या बताएं। आप स्वयं ही सुन लीजिए।
आज का साइकिल गीत उस दौर के हिन्दी सिनेमा की लोकप्रिय अभिनेत्री कुमकुम पर फिल्माया गया है। कुमकुम ने 1950 से 1970 के दशक तक अनेक फिल्मों में अपनी सादगी, चुलबुले अभिनय और मनमोहक नृत्य से दर्शकों का दिल जीता। इस गाने में भी उन्होंने उनकी सहज मुस्कान के साथ मनभावक अदाएं बिखेरी हैं। और यही उनकी पहचान रही है।
फिल्मी भगत जानते हैं कि फिल्म दो गुंडे सुबीराज (पृथ्वीराज कपूर के भांजे) की पहली फिल्म थी। सुबीराज को प्रायः उनके चरित्र अभिनय के लिए जाना जाता है। आज के गाने में वो युवा, आकर्षक नायक के रूप में दिखाई देते हैं।
हमने तो आज सुबह ही इस गाने को खूब जोर से सोलो ही गा लिया कस्तूरबाग्राम और रालामंडल के बीच में खेतों वाले रस्ते में साइकिल चलाते हुए।
क्या कहा गा कर भी सुनाएं!? भियाओ अकेले में गाने की हिम्मत है पर सुनाने की नहीं। आप सभी हमारे मित्र हैं, दुश्मन नहीं!
पुराने खयालात के हैं इसलिए बॉथरुम में और अकेले में ही गा के 'संगीत की खुजली' मिटा देते हैं। अब बाथरूम सिंगर भी लगभग लुप्तप्राय हैं। लगभग सभी बाथरूम सिंगर स्टार मेकर आदि प्लेटफॉर्म पर आकर 'स्टार' बन चुके हैं। हमारे जैसे कुछ अभी भी बाथरूम में ही टिके हुए हैं।
हमारा ऐसा नहीं है कि लोगों को घेर-घेर कर कहीं भी एक हाथ में मोबाइल और दूसरे हाथ में माइक लेकर कराओके वाला गाना सुनाना शुरू कर दें! हमें आपकी आन, बान, शान, मान और कान का बहुत ध्यान है, इसलिए तान नहीं छेड़ेंगे।
जब रफी और आशा जैसे असली कलाकारों का श्रेष्ठ गाना सहज उपलब्ध है तो हम क्यों गाएं और पकाएँ!?
आप तो बस असली गाना सुनिए, लहरों में झूलिए:
लहरों में झूल के, खुशियों में फूल के, देखो जी दीवाने हॉलिडे मनाने चले, लिखना-पढ़ना भूल के
बाकी बातें होती रहेंगी। साइकिल और संगीत तो हम सबके घर की खेती है।
पंकज खन्ना
9424810575
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