(29) ओ ज़रा रुक जा प्यारे रुक जा!
गीत: ओ ज़रा रुक जा प्यारे रुक जा। फिल्म: सितारों से आगे (1958)। गायक: रफ़ी। गीतकार: मजरूह सुल्तानपुरी! संगीतकार: एस डी बर्मन। पर्दे पर: जॉनी वॉकर, शम्मी और अन्य साथी। गाने के बोल। फिल्म के सभी गाने।
(जॉनी वॉकर और शम्मी। फिल्म में लट्टू और लट्टू की गर्ल फ्रेंड।)सन सत्तर के दशक में यानि हमारे बचपन में मनोरंजन के नाम पर बहुत कुछ होता था: फिल्में, रेडियो पर गाने, फिल्मों और गानों पर अविरत चर्चा, क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी, कबड्डी, सर्कस, जादू के खेल, दोस्तों के साथ साइक्लिंग और साइक्लिंग के करतब! ना मोबाइल ना टीवी, सिर्फ मटरगश्ती, दिन भर!
पारसी मोहल्ले के पास स्थित एक सरकारी स्कूल के मैदान में हर साल कोई न कोई एक कलाकार तीन से सात दिनों तक के लिए लगातार दिन रात साइकिल चलाकर साइकिल के विभिन्न करतब दिखाया करता था। इन्हें नट, बाजीगर, साइकिल वाले भिया या साइकिल वाले बाबा कहा जाता था। और इस विधा को साइकिल सर्कस भी कहा जाता था।
ये कलाकार बिना जमीन पर पैर रखे, साइकिल पर विभिन्न प्रकार के संतुलन वाले करतब, नृत्य और कलाबाजियां दिखाते थे। यह कला शारीरिक संतुलन, ताकत और साइकिल पर असाधारण नियंत्रण का सुंदर प्रदर्शन होती थी। करतब दिखाने के लिए उपयोग की जाने वाली साइकिलें सामान्य ही होती थीं; बस इनमें मडगार्ड, स्टैंड और कैरियर नहीं होते थे। और हैंडलबार 360 डिग्री तक घूम सकता था।
-दोनों हाथ छोड़कर साइकिल पर खड़े हो जाना।
-हैंडल पर उल्टे बैठ कर साइकिल चलाना।
पारसी मोहल्ले और छावनी के सेठ लोगों से और आसपास के सभी मोहल्लों से इन परिश्रमी कलाकारों को अनाज, नए-पुराने कपड़े और काफी पैसा मिलता था।
हम दस बारह साल की उम्र के बच्चों के लिए ये सबसे बड़े कलाकार और 'धनी' होते थे और तब हम भी बड़े होकर यही बनना चाहते थे। हीरो या क्रिकेटर बनने की चाह का जन्म तो बहुत बाद में हुआ था।
जब ये साइकिल के करतब दिखाए जाते थे तो हम समय पर घर पहुंचने में कई बार चूक जाते थे। घर का नियम बिल्कुल साफ था: कितनी भी मटरगश्ती कर लो, 'चंपई अंधेरा' होने से पहले घर पहुंचना ही है।
जब देर से घर पहुंचो तो माँ-बाप निहाल हो जाते थे। बहुत लाड़ प्यार करते थे। गालों पर फिंगर प्रिंट्स वाले बहुत सारे प्यारे-प्यारे टैटू बना देते थे। ये टैटू एक दो दिन तक बने रहते थे। धोने से या रगड़ने से और निखर जाते थे। बड़े भाई और बहन हँस-हँस कर बारीकी से इन टैटूओं का अध्ययन करते थे!
कभी अंगुली छाप वैज्ञानिक (Finger-print Expert, Dactyloscopist) कभी हस्तरेखाविद (Palmist) बन जाते थे! बहुत अच्छा था कि तब मोबाइल नहीं थे!
किस्सेबाजी को विराम दिया जाए! अगर आपने पहले कभी साइकिल पर करतब नहीं देखे हैं तो बस आज के इस साइकिल गीत में जॉनी वॉकर के कुछ करतब देख लीजिए।
इस साइकिल गीत के संगीतकार एस डी बर्मन हैं। हमेशा के समान इन्होंने बहुत शानदार संगीत दिया है। गाने में उन्होंने एक जगह बाउल संगीत को बड़े मसखरे अंदाज में पेश किया है। अच्छे से सुनिये। जॉनी वॉकर के गाने रफी के बिना अधूरे हैं। और सोने में सुहागा मजरूह के गाने के अनुरूप शब्द हैं।
गाने में शुरू में लट्टू भिया (जॉनी वॉकर) पेड़ पे लटके दिखाए गए हैं। नीचे सड़क से शम्मी (लट्टू की गर्लफ्रेंड) और अन्य लड़कियां अपनी-अपनी साइकिल से टुनटुनाते हुए निकल रही हैं। लट्टू, लट्टू होकर, लटके-लटके, लटके-झटके दिखाकर गा रहे हैं: ओ ज़रा रुक जा प्यारे रुक जा। लेकिन कोई भी नहीं रुकती है।
अब लट्टू भिया पेड़ से उतरकर नीचे आ जाते हैं और साइकिल धारिणियों को लगभग पकड़-पकड़ कर गाने लगते हैं: ओ ज़रा रुक जा प्यारे रुक जा।
लड़कियां बगीचे में पहुंच जाती हैं और ये भी नाचते गाते वही पहुंच जाते हैं। गेंद के साथ थोड़ी सी बाजीगरी भी दिखाते हैं। और वहां लड़कियों के साथ चकरी (झूले) में भी घुस जाते हैं। ( इस चकरी वाले सीन के समय एस डी बर्मन का संगीत ध्यान से सुनिये।)
फिर वो एक साइकिल कबाड़ लेते हैं और अपनी गर्ल फ्रेंड के पीछे गोल-गोल साइकिल चलाने लगते हैं।
अंत में सबको रिझाने के लिए साइकिल पर करतब दिखाना शुरू कर देते हैं।
पूरे करतब देखने हों तो गाना देख लीजिए, मजा आएगा। (वैसे गाने को बारीकी से देखने से लगता है कि साइक्लिंग के करतब शायद जॉनी वॉकर के डुप्लीकेट ने किए हैं। शायद।)
आपको देसी मेले वाले साइकिल सर्कस का ठीक से अंदाजा हो जाए इसलिए कुछ वीडियो के लिंक नीचे लगा दिए गए हैं:
(2) फिल्म शोर (1972) में मनोज कुमार की नॉन स्टॉप साइक्लिंग।
(3) हाथ से पैडलिंग, साइकिल को लगभग लिटाकर।
(4) साइकिल पर साइकिल।
और अगर आप Artistic Cycling का International Professional नमूना देखना चाहते हैं तो ये वीडियो देखें।
क्या आपकी जानकारी में कोई और हिन्दी फिल्म भी है जिसमें साइकिल पर करतब दिखाए गए हों? अगर कोई भी जानकारी हो तो अवश्य साझा करें।🙏
पश्च लेख (PS):
* हम बच्चों को बड़ी जिज्ञासा होती थी कि ये कलाकार सुबह साइकिल छोड़कर बमपुलिस ( पब्लिक टॉयलेट) कैसे जाते होंगे? हमें तो ये बताया गया था कि मोहल्ले के बुजुर्ग इस "अखंड साइकिल सर्कस" की निगरानी के लिए रात-रात भर पहरा भी देते थे। इसीलिए मोहल्ले के कई बुजुर्गों से पूछा गया: "ये बमपुलिस कैसे जाते हैं"? उत्तर में नाना प्रकार की उच्च कोटि की गालियाँ सुनने को मिलती थीं, जिनका अस्तित्व अब खतरे मे है। क्योंकि सत्तर के दशक वाले वो बच्चे अब बूढ़े होकर ध्यान, सुमिरन और भक्ति में लग गए हैं। तवा संगीत, रेल संगीत और साइकल संगीत भक्ति का ही एक प्रकार है।🙏
पचास साल से अधिक हो गए। गालियां मिली लेकिन बमपुलिस वाला उत्तर कभी नहीं मिला। जब भी मिलेगा, आपको बताएंगे जरूर!
पंकज खन्ना
9424810575
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