(32) बन के पंछी गाएं प्यार का तराना।

 फिल्म: अनाड़ी (1959)। गायक: लता और साथी। गीतकार: हसरत जयपुरी। संगीतकार: शंकर जयकिशन। पर्दे पर: नूतन, राजकपूर और साथी। गाने के बोलफिल्म के सभी गाने

आज का गीत हिन्दी फिल्मों के यादगार साइकिल गीतों के 'हॉल ऑफ़ फ़ेम' में अपनी साइकिल की घंटी और भोंपू ज़ोर से बजाता है। और हाँ, यह पिकनिक का पूरा सामान भी साथ लेकर चलता है।🚲🧺

गाने की शुरुआत में नूतन सखी-सहेलियों के साथ बन में साइकिल चलाते हुए दिखाई गई हैं। कुछ लड़कियाँ दो चोटी में भी दिखाई देती हैं। अब ऐसे सीन दिखाई नहीं पड़ते।

                

वो सब हँस-हंस के गा रही हैं: बन के पंछी गाएं प्यार का तराना। सभी लड़कियां खुले वातावरण में साइकिल चलाते हुए जीवन और प्रेम की उमंग व्यक्त करती दिखाई देती हैं। 

( ऊपर वाली फोटो में ढीली-ढाली शर्ट  पहने टोकरी वाली साइकिल की सवार शायद जूनियर आर्टिस्ट Tina Misquita हैं, जो अभिनेत्री किमी काटकर की माताजी हैं।)

गीत का भाव अत्यंत सरल और मनमोहक है। पंछियों की तरह मुक्त होकर प्रेम के गीत गाने की कल्पना इसमें की गई है। 

खेतों की हरियाली, पर्वत श्रृंखलाएं, जंगली और ग्रामीण रास्ते, प्रकृति की रंगीन छटा और ये साइकिल वाली परियाँ इस गीत को नैसर्गिक  सौन्दर्य से भर-भर देती हैं।

“मिल जाए अगर आज कोई साथी मस्ताना” जैसी पंक्तियाँ युवा मन की सहज आकांक्षाओं, प्रेम की चाह और जीवन के उत्सव को व्यक्त करती हैं। 

नूतन के दिल की आवाज़ वाला 'कोई साथी मस्ताना' यानी राजकपूर। और वो जंगल के कच्चे रस्ते से मस्त साइकिल चलाते हुए जा रहे हैं, मेन रोड की ओर लड़कियों की तरफ। उनकी साइकल पर पुराने जमाने वाला साइकिल का भोंपू लगा हुआ है।

(ज़रा याद करिए तवा संगीत का 'सीताराम सटक गए, थाली लोटा पटक गए' वाला भोंपू संगीत!)

शंकर-जयकिशन का चंचल संगीत, लता  की कोमल आवाज़ और नूतन की स्वाभाविक अभिनय शैली मिलकर इस गीत को अविस्मरणीय बना देते हैं। यह केवल एक प्रेमगीत नहीं, बल्कि यौवन, आशा और जीवन की उमंग का संगीतात्मक उत्सव है। आज भी यह गीत सुनते ही खुले आकाश में उड़ते पंछियों के साथ गुनगुनाता हुआ अनुभव होता है।

इस गीत की विशेषता यह है कि साइकिल की गति और गीत की लय एक-दूसरे के साथ चलती हैं। आसपास की हरियाली, खुला आकाश, पंछियों का बिंब और सड़क पर आगे बढ़ती साइकिल, मिलकर आपको एक मुक्त और आनंदमय संसार में ले जाते हैं। और साइकिल यहाँ मानो उन पंखों का काम करती है जो नायिका को उड़ने का एहसास कराते हैं।

अब ज़रा क्लाइमैक्स का मज़ा लीजिए। लड़कियों की साइकिल राज कपूर की साइकिल से ऐसे टकराती है जैसे साइकिल नहीं फिल्मी दिल हों।

निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी ने शायद पहले ही तय कर रखा था कि बिना साइकिल-टक्कर के दर्शकों के पैसे वसूल नहीं होंगे। साइकिल संगीत के नियमित पाठकों के लिए यह दृश्य नया नहीं होगा। और फिर शुरू होता है यह प्यारा-सा फिल्मी तमाशा!

ऐसी साइकिली टक्करों में गलती चाहे न्यूटन की हो या नियति की, फैसला हमेशा लड़कों के ख़िलाफ़ ही जाता है। यहाँ भी बेचारे राज कपूर को लड़कियों की खरी-खोटी सुनने का पूरा सौभाग्य प्राप्त होता है।



और फिर, जैसा कि हिन्दी फिल्मों का सनातन नियम है, डाँट-फटकार का मौसम ज़्यादा देर नहीं टिकता। राज कपूर और नूतन बातचीत शुरू करते हैं, और देखते ही देखते साइकिल की चेन सीधे प्रेम की गाड़ी हांकने लगती है!



बस, यही सब बातें हैं...! हमें तो फ़िल्मों में सबसे प्यारा यही गणित लगता है। लोग कहते हैं कि हीरो-हीरोइन की केमिस्ट्री कमाल की है। हमें तो लगता है कि केमिस्ट्री बाद में आती है, पहले उनका गणित सही होना चाहिए। जब कलाकारों का हिसाब-किताब जम जाए, तो गाना अपने-आप हिट हो जाता है। 

आगे भी ऐसी ही साइकिली गप्पें, फिल्मी ज्ञान गणित और गीतों की सैर यूँ ही चलती रहेगी। भिया राम!💐🙏


पंकज खन्ना 

9424810575



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