साइकिल रिक्शा और रीजेंट सिनेमा नागपुर।


आज का विशेष ब्लॉगपोस्ट: साइकिल रिक्शा और रीजेंट सिनेमा नागपुर।

साइकिल संगीत में अब तक 25 साइकिल गीतों पर ब्लॉग पोस्ट्स लिखे जा चुके हैं।  25 वाँ ब्लॉग पोस्ट है: चोरी चोरी दिल का लगाना बुरी बात है। 

ये साइकिल गीत दरअसल साइकिल रिक्शा पर फिल्माया गया है। इस  साइकिल गीत नंबर 25 से बहुत सारी यादें जुड़ी हुई हैं। इस विशेष ब्लॉग पोस्ट में इन सभी यादों को संजोया गया है। इसे भी आप साइकिल संगीत का ही विस्तार या हिस्सा समझें। अगर आपको इन किस्सों में दिलचस्पी नहीं है तो सीधे साइकिल गीत चोरी चोरी दिल का लगाना बुरी बात है पर लिखे ब्लॉग पोस्ट को पढ़ सकते हैं।

प्रथम भाग: रीजेंट सिनेमा और बावा बावी।



जनवरी 1985 में हिंदुस्तान पेट्रोलियम खापरी LPG प्लांट नागपुर में पोस्टिंग हुई।  एक हफ्ते  में काम करते हुए ये समझ आ गया था कि अगर मराठी बोल सकें तो प्लांट के मजेदार वर्कर्स के साथ  नौकरी और ज्यादा मजेदार हो जाएगी। मराठी सीखो अभियान जोर शोर से शुरू हो गया। 

शाम को एक दिन घर की बहुत याद आ रही थी। फिर सीताबर्डी, वैरायटी स्क्वेयर  के पास स्थित रीजेंट सिनेमा में  मराठी फिल्म देखने अकेले ही पहुंच गए। टिकट लिया, थोड़ा टाइम था तो पास ही बने कैफे रीजेंट के एक कोने में बैठकर चाय पीते हुए  आदतानुसार ग्राहकों की स्कैनिंग शुरू कर दी। आस पास अधिकतर लोग देसी लिबास यानी सफेद कुर्ते पजामे और टोपी में थे।

लेकिन दूर कोने में एक बुजुर्ग पारसी बावा बावी इस कैफे का प्रसिद्ध 'मटन चाप' खा रहे थे। नागपुर में Mutton Chop को Mutton Chaap ही कहा जाता था।

अब तक की लगभग सारी जिंदगी इंदौर के  पारसी मोहल्ले में ही बीती थी। बावा बावी को देखकर बहुत खुशी हुई। लगा बस पारसी मोहल्ले में फिर से पहुंच गए हैं! याद हैं न आपको हमारे पारसी मोहल्ले वाले पारसी अंकल और उनके किस्से, तवा संगीत वाले!?

मटन चाप खाने के बाद वो कैफे से सिनेमा हाल में आ गए  और  बाहर बेंच पर बैठकर दरवाजे के खुलने का इंतज़ार करने लगे। हम लपक लिए। जबरदस्ती उनको अपना इंदौरी पारसी मोहल्ले वाला परिचय दिया। बावा शायद बावी के लगातार बोलने से परेशान थे। खुश होकर सीधे हमारी तरफ मुखातिब हो गए और  'सरळ' बोलना शुरू कर दिया!

फिर जो नागपुरी हिंदी में बोलना शुरू किया तो रुके ही नहीं, बावी के रोकने के बाद भी! हम भी सिर्फ सुनना ही चाहते थे! हमें तो उनमें इंदौर वाले पारसी अंकल दिख रहे थे!

उन्होंने अंग्रेज़ों के जमाने के रीजेंट सिनेमा, रीजेंट सिनेमा की सोफे नुमा खटमल भरी सीटों, विलायती पर्दे,  सिनेमा हाल के मालिक और बूटी कम्पाउंड ( जहां ये सिनेमा हाल स्थित था) के बारे में बड़ी प्यारी नागपुरी स्टाइल में नागपुरी शब्दों  में बताया। सिनेमा हाल के मालिक और उनके दोस्त को 'चमन दूधिया', भौंकन्या, अगाऊ और सिनेमा हाल को लाचांड बता रहे थे। और भी बहुत सारे नागपुरी शब्द बहुत प्यार से बोले थे। कभी मिलो अकेले में तो और शब्द बताएंगे! 

(ये वो प्यारी स्टाइल है जिसे फिल्म वाले कभी फिल्मों में दिखा ही नहीं पाए! बस वो तो सिर्फ बम्बईया स्टाइल के पेस्टन जी दिखाते रहे। वो कभी इंदौर या नागपुर गए ही नहीं! कोई फिल्म मेकर हमसे भी मिल ले कभी!😛)

और फिर उन्होंने कैफे रीजेंट के मटन चाप के बारे में बताना शुरू किया कि कैसे वो शादी के बाद से ही बावी के साथ रिजेंट सिनेमा में आते रहे हैं: बावी सिनेमा के लिए, और बावा मटन चाप के लिए! अदभुत कंट्रोल था उनका। सुनाते सुनाते उनका मुँह लार से भर गया पर मजाल है कि एक बूंद भी बाहर  टपक जाए!

बस इस एक 15 मिनट की मीटिंग के बाद  ही बावा बावी से, नागपुर के इस रीजेंट सिनेमा/ कैफे रीजेंट से और नागपुर से भी हमेशा के लिए प्यार हो गया।

उसके बाद कभी उनसे मुलाकात नहीं हुई। लेकिन याद आज भी बनी हुई है। आज तक अफसोस है कि उनसे उनका पता ही नहीं पूछा था। ऐसे चमन थे हम! उमर के साथ अब थोड़े और ज्यादा हो गए हैं!

(नागपुर के पारसी बावा लोग बहुत बड़े दिलवाले होते हैं। इतने बड़े दिल वाले कि एक पारसी बावा Mr. DPR Cassad ने पचास के दशक में हमारे कॉलेज SGSITS इंदौर को उनका स्वयं का एक Industrial Steam Engine ही भेंट कर दिया! इसके बारे में और अधिक जानने के लिए पढ़ें हमारा ब्लॉग: Mysterios Steam Engine at SGSITS.)

भारत के एकमात्र बचे इस Borsig Industrial Steam Engine को पीछे छोड़कर तरुण के साइकिल रिक्शे पर आ जाते हैं। साइकिल और गाना तो वोइच खींचेगा बावा!



द्वितीय भाग: रीजेंट सिनेमा और तरुण का साइकिल रिक्शा।


रीजेंट की मराठी फिल्म खतम हो गई। बावा बावी चले गए। लेकिन एक ही दिन का दूसरा सुखद आश्चर्य बाहर साइकिल रिक्शा पर सवारियों की टोह ले रहा था। बाहर आए, उससे जगह और पैसे की बात की और फिर उसकी साइकिल रिक्शे में धम्म से बैठ गए। इस सुखद आश्चर्य का नाम था: तरुण।

इंदौर में साइकिल रिक्शा नहीं होती थीं। नागपुर में आकर ही पहली बार साइकिल रिक्शा की सवारी की थी। और इन साइकिल रिक्शे और साइकिल रिक्शे वालों की भाषा से शुरू से ही लगाव हो गया था। तरुण को हर दूसरे नागपुरी के समान हर किसी को बावा कहने की आदत थी। यहां बावा बोलने में पारसी बावा से कोई मतलब नहीं होता है।

(तरुण, बावा, बावी, रीजेंट सिनेमा नागपुर, कैफे रीजेंट, मटन चाप और चाय। काल्पनिक फोटो। फोटो के इनसेट में रीजेंट सिनेमा का वास्तविक फोटो देख सकते हैं।अफसोस, रीजेंट सिनेमा बहुत पहले बंद होकर ओपेरा हाउस बन चुका है।)

रीजेंट सिनेमा की विभिन्न और ढेर सारी फोटो उत्साह के साथ भेजने के लिए प्रिय मित्रों संजय अग्रवाल (  लेखक और Commissioner Income Tax, Nagpur), देवेंद्र मिश्रा (Govt.Auditor, Singer and Cyclist), बंडू उर्फ बंडया मंजे वेंकट (Govt.Auditor, Singer and Cyclist), बाप दीपक देवतारे ( समाज सेवक)  और बैच मेट उदय गानू ( इंडस्ट्रियलिस्ट) को दिल से धन्यवाद!❤️🙏

तरुण की सन 1985 में उम्र  रही होगी 35-40 के बीच में। वो फिल्मों का बहुत शौकीन था। साइकिल की लाल सीट पर उसने लिखा रखा था: चोरी चोरी दिल का लगाना

उससे पूछा इसका मतलब क्या है तो उसने बताया ये एक गाना है जिसे फिल्म बड़ा भाई में अमिता  पर फिल्माया गया था। उसने बताया फिल्म में हीरो साइकिल रिक्शा चालक था और उन पर ये गाना फिल्माया गया था। तरुण को अमिता और अमिता की अदाएं बहुत पसंद थी। वो अमिता के बारे में बात करते हुए शर्माने लगता था! सच कहें तो तरुण से मिलने से पहले अमिता का नाम भी नहीं सुना था।


         (तरुण का काल्पनिक 'डाव') 


ऐसे फैन ही हैं जो फिल्मों, एक्टरों और संगीत कलाकारों को महान बनाते हैं। लेकिन ऐसे फैन लोगों की कहानी उनके जाने के साथ ही खत्म हो जाती है। ऐसे काबिल सुनकारों के किस्सों के बगैर तवा/ रेल/ साइकिल संगीत अधूरे हैं।

तब से यानी पिछले 41 सालों से ये गाना और तरुण दिमाग में बसेला है। बोले तो, पड़ेला है, जमेला है। गाना तो कई बार सुना होऐंगा इन सालों में लेकिन वीडियो पिछले साल साइकिल संगीत की शुरुआत के बाद ही पहली बार देखा। तब से इंतज़ार था  इस गाने के  नंबर आने का! आप भी चाहें तो पहले गाना देख लें। आप भी मानेंगे कि तरुण की चॉइस एक नंबर है, बावा!

वो 'संतरा' पीकर रिक्शा चला रहा था।जबान लड़खड़ा रही थी पर साइकिल रिक्शा नहीं। वो हिंदी वाली मराठी में बोलता गया, हम मंत्र मुग्ध सुनते रहे। नागपुरी भाषा की पहली क्लास पारसी बावा ने ले ली थी। अब उसी दिन तरुण  की क्लास शुरू हो गई थी। उन्होंने भी हमारी  Vocabulary को सुधारने का ठेका ले लिया। हमने भी जल्दी ही अपने भाषा सुधार ली और बोलने लगे: आएंगा, जाएंगा, खाएंगा, पिएंगा। इंदौरी शब्द भिया बोलना छोड़ दिया, बावा बोलना शुरू कर दिया, बावा! 

अगले दिन प्लांट में पहुंचे तो ये सब शब्दों को बोलकर बम्म माहौल कर दिया! आपको पहले ही तवा संगीत में बता चुके हैं कि प्लांट में वर्कर और अन्य अफसर साथी हमारे लिए यही बोलते थे: ये मॉडल ऐसा ही आता है!

हमारा घर जय प्रकाश नगर में था। और उसका घर समीप ही स्थित खामला में था। वो रीजेंट सिनेमा के रात के 6 से 9 बजे के शो के बाद सिर्फ खामला के आसपास की सवारी लेता था। हम तो उसके रेगुलर ग्राहक हो गए। बहुत कुछ बताना है तरुण और हमारे खापरी LPG प्लांट के बारे में। 

अगला साइकिल गीत भी साइकिल रिक्शा गीत है। तरुण की बात भी तब आगे बढ़ाएंगे! और ये भी बताएंगे कि जब तरुण को पीछे बैठाकर  बर्डी से खामला तक साइकिल रिक्शा चलाई तो खापरी में  बम्म चेंगड़ हो गया! 

चालीस साल के बाद ये किस्से याद कर रहे हैं! थोड़ा टाइम लगेंगा। खाली पीली बोम नहीं मारने का बावा। अभी तो बस तरुण को समझने का और गाना भी समझने का: चोरी चोरी दिल का लगाना बुरी बात है!

तृतीय भाग: साइकिल रिक्शा और HPCL.

हमारे खापरी LPG प्लांट में दो 1965 की बनी जावा मोटरसाइकिल थीं। ये तब यानी 1985 में भी Antique ही कहलाती थीं। इनपे हमसे पहले दो ज्वाइन किए ऑफिसर अपना हक जमा चुके थे। लेकिन हमें कभी कभी पीछे बिठा लिया करते थे।


वे हमें अक्सर खापरी से सीताबर्डी छोड़ दिया करते थे। वहां से वो अपने रास्ते और हम अपने रास्ते। कमाना शुरू कर दिया था। हमारे शौक हावी हो चुके थे। पुराने तवे ( 78 RPM रिकॉर्ड्स) और पुरानी किताबें ढूंढना और किफायत से खरीदना। पुरानी किताबों और पुराने रिकॉर्ड्स की सुगंध ( Vellichor) हमें पूरे नागपुर में घुमाती थी। अधिक जानकारी के लिए आपको तवा संगीत पर जाना पड़ेगा:) 

घूम फिर कर, खा पी कर रीजेंट के पास पहुंच जाते। कभी-कभी तरुण मिल जाता था और फिर सुनते थे  'संतरे' में सने हुए उसके किस्से उसी की साइकिल रिक्शे पर!

ऐसे ही किसी एक दिन रात को नौ साढ़े नौ बजे उसके साइकिल रिक्शे पर पसरे पसरे खयाल आया कि क्यों ना रिक्शा चलाया जाए। तरुण से पूछा तो उसने साफ मना कर दिया।

उसको समझाया कि उसको उसके पैसे बराबर मिलेंगे पर वो फिर भी नहीं माना। फिर उसको नागपुरी 'पातोड़ी' खिलाने की पेशकश की। वो तुरंत मान गया! पातोड़ी ने उसके जमीर के चिन्दे चिन्दे कर दिए! अब हम राजा थे!

बर्डी से साइकिल रिक्शा चलाना शुरू किया। नीरी तक पहुंचते पहुंचते हाथ पैर टाइट हो गए। लाचांड पीछे बैठ कर पातोड़ी और ढेर सारी हरी मिर्चें भकोसे जा रहा था और ज्ञान बांट रहा था! गर्मी के दिन थे! वो भी नागपुर की गर्मी!!

अब टी शर्ट उतारकर रिक्शा चलाना शुरू किया। थोड़ा आराम आया। लेकिन सिर्फ एक रात के लिए!

अगले दिन सुबह जनरल शिफ्ट में 9 बजे ऑफिस में पहुंचा तो ढेर सारी आंखों को घूरता पाया। पहले तो कुछ समझ नहीं आया। फिर मालूम पड़ा कि प्लांट मैनेजर आगाशे साहब ने 10 बजे उनके कमरे में बुलाया है।

एक हीरो के माफिक उनके रूम में एंट्री मारी। लेकिन वहां का माहौल बड़ा गंभीर था। सारी हीरोगिरी एक सेकंड में झड़ गई। ऐसा लगा जैसे वार रूम में कोई मिलिटरी जनरल और उनके चुने हुए साथी चिंता मग्न हैं।


कोई हेलो हाय नहीं, कोई हैंड शेक नहीं, कोई प्रस्तावना नहीं। एक बुजुर्ग अधिकारी सीधे मुद्दे पर आ गए: "तुम्हें हिंदुस्तान पेट्रोलियम इतनी अच्छी सैलरी देता है। इतने  पैसे कहां उड़ा देते हो कि साइकिल रिक्शा चलाने की नौबत आ गई!?"

फिर एक आवाज़ आई: "बनियान पहनकर रिक्शा चलाते हो, शर्म नहीं आती!?"

( मन ही मन में उन्हें उत्तर दे दिया: "ठीक है बावा, अगली बार शर्ट पहन के चलाएंगे!" ये उत्तर सिर्फ मन में ही दिया था, लेकिन फिर भी थोड़ा सा कॉन्फिडेंस आ गया और थोड़ी सी स्माइल भी!)

ये स्माइल तीसरे को बिल्कुल पसंद नहीं आई। बोलने लगे: "कितने बेशर्म हो! हिंदुस्तान पेट्रोलियम का नाम खराब कर दिया। शहर के सब डीलर लोगों को और प्लांट के सभी वर्कर्स को तुम्हारी हरकत के बारे में पता चल गया है! जानते हो हेड ऑफिस को मालूम पड़ेगा तो क्या होगा!?"

( मन ही मन उत्तर दिया: "फिर जिंदगी भर साइकिल ही चला लेंगे बावा! मजे करेंगे।" लेकिन इस बार स्माइल को साला वहीं दबोच डाला! बहुत जल्दी मैच्योरिटी प्राप्त कर ली थी!!)

अब आगाशे साहब की बारी थी। वो बाकी लोगों की बातों को नजरअंदाज करके  हँस कर टाल दिए और बोले: "तुम्हें पैसे की जरूरत थी तो मुझे बोल देते। तुम तीन ऑफिसर के बीच में दो मोटर साइकिल हैं, फिर भी साइकिल रिक्शा!? तुम मोटर साइकिल चलाओ, पेट्रोल के पैसे भी कंपनी देगी। जरूरत पड़े तो प्लांट की जीप भी ले सकते हो। लेकिन साइकिल रिक्शा नहीं होना! अगली बार ऐसी शिकायत नहीं आनी चाहिए।"

( मन में कहा: "अरे सर, जीप का नाम तो हमने द्रौपदी रख छोड़ा है। पांच लोग इसके स्वामी हैं। हम तो साइकिल या साइकिल रिक्शा से ही काम चला लेंगे।")

23 साल की उम्र में जितनी शालीनता से बात की जा सकती है, उतनी ही शालीनता से बाते करते हुए 'सॉरी सर', 'सॉरी सर' बोलकर जल्दी से पल्ला झाड़ लिया!

प्लांट के लोगों ने इसके बाद अलग ही नज़रों से देखना शुरू कर दिया। वर्कर्स के लिए हीरो। और ऑफिस स्टाफ के लिए विलेन। फिर क्या हुआ!? कुछ खास नहीं! 

बस, हुई शाम उनका खयाल आ गया! 

और फिर रीजेंट पहुंच गए, बावा!!!

To be continued...!



पंकज खन्ना 
9424810575 


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हिन्दी में:

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Love Thy Numbers : गणित में रुचि रखने वालों के लिए।
Love Thy Squares: Magic Squares के बारे में।
Epeolatry: अंग्रेजी भाषा में रुचि रखने वालों के लिए।
CAT-a-LOG: CAT-IIM कोचिंग।छात्र और पालक सभी पढ़ें।
Corruption in Oil Companies: HPCL के बारे में जहां 1984 से 2007 तक काम किया।

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